Wednesday, September 29, 2010

उड़ान

मैंने आसमान में कुछ पतंगें उड़ाई हैं.
उन्हें खुल कर उड़ने को पूरा गगन दिया.
जितनी जरुरत थी उतनी ही ढील दी.
चाँद-सूरज को छू लेने की आस लिए
पतंगे अपनी मंजिलों की और भाग रहीं थीं.
कि राह में उन्हें ऊँची इमारतों
बिजली के खम्भों ने रोक लिया
अब अधर में लटक कर तूफानी हवा के थपेड़ों से चीथड़ों में बटना
या फिर बारिश के पानी में गलते रहना
क्या यही उनकी नियति होगी?
लेकिन मैंने अपनी आँखें मूँद ली हैं
कान बंद कर रखे हैं
क्योंकि मैंने पतंगों की डोर
अपने दिल के तारों से जोड़ रखे थे .


Sunday, September 19, 2010

मैं पिछले कई महीनो से दिल्ली में हूँ. अपने बच्चों के पास. सभी बच्चे अब बड़े हो गए हैं, स्वभाविक है उनकी अलग ही दुनिया है. आज कल के युवाओं की दुनिया काफी अलग किस्म की है. अपने समय में हमारी भी अलग थी, लेकिन जहाँ हम पढाई के अलावा -लड़की हो तो सिलाई-कढाई-बुनाई, कुछ माँ के काम में हाथ बटाते थे और लडके हो तो बाहर जा कर खेलना, या साईकिल स्कूटर, चंद दोस्तों के साथ अड्डेबाजी. दोस्तों मित्रों का दायरा काफी छोटा होता था. जब कमाने धमाने के चक्कर में पड़ गए तब तो प्रायः यार दोस्तों का साथ छूट ही जाता था .
अब जो मैंने इनकी दुनिया में झांक कर देखा तो मुझे बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ, इनकी दुनिया तो बड़ी दिलचस्प है. ढेर सारे लोग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. अपना हर सुख- दुःख साझा करते हैं. मोबाईल क्रांति तो है ही, मगर इस फेस-बुक ने तो कमाल ही कर दिया है. देखते ही देखते आप एक बड़े ग्लोबल परिवार में शामिल हो जाते हैं. तार से तार जुड़ते चले जाते हैं और आप पर भरी पूरी दुनिया में रहने का अहसास छा जाता है.
जैसे ही अपनी खुशियों का कोई फोटो आप लगाते हैं -बधाइयों का ताँता लग जाता है. अब तो मोबाईल उठाने की भी जरुरत नहीं होती. ऑफिस का काम करते हुए, कब अपने दोस्तों को सन्देश भेज दिया बॉस को पता भी नहीं चलता. तभी तो पूरे दिन फेस बुक का चक्कर चलता रहता है. और शाम को तो लगता है सभी एक ग्लोबल मैदान में उतर आये हों.

Monday, September 13, 2010

दोहरी ज़िम्मेदारी

हमारे पड़ोस में एक दंपत्ति रहते हैं। दोनों कमाते हैं. पति अच्छा खासा कमाता है .लड़की बीमार रहती है.फिर भी शाम को जल्दी आ कर खाना बनती है. मैंने उस से पूछा - क्या तुम्हारा नौकरी करना इतना ही जरुरी कि तुम्हारी सेहत ही ख़राब हो जाये? उसने कहा फिर मेरी पढाई का क्या मतलब रह जायेगा. यानि आज कल कि लड़कियों कि आम सोच मतलब नौकरी - चाहे वो किसी भी कीमत पर मिले. उनको अभी ये समझ नहीं आ रहा है कि अपनी सेहत और अपने बच्चों के मानसिक विकास के रूप में वे कितनी बड़ी कीमत चुका रही हैं. प्रकृति ने तो अपने हिसाब से बड़ी बढिया व्यवस्था की- पुरुषों को मेहनत कर कमाने के लिए बनाया और औरतों को एक महान काम - पुनर्निर्माण - की जिम्मेदारी दी. उसने उसे कोमल और सुन्दर बनाया - वह प्राकृतिक रूप से कोमल होती है इस लिए उसे मेहनत वाले काम करने ही नहीं चाहिए, जीवन में रंग भरने के लिए उसे सुन्दरता मिली है, लेकिन आजकल सभी मूल व्यवस्थाओं में उलट फेर हो रहा है .चाहे वह पर्यावरण हो या मानव जीवन -ज्यादातर खामियाजा औरतों को ही भुगतना पड़ता है, अपने को ज्यादा काबिल साबित करने का चक्कर कहिये या आत्मनिर्भर होने कि इच्छा, आजकल की लड़कियां अपने सर पर दोहरी जिम्मेदारी ढो रही हैं.

Monday, September 6, 2010

.आई भोरे सं पानि लदने अछि .पछिला एक सप्ताह सं यैह भय रहल छैक .ओछान-बिछान ,घर -आगन ,सबटा सेमल बुझाइत अछि .भरोस नहि होइया जे आब जल्दी उबेर हेतैक .अहि लोक के,कि कही जखन मुख्यमंत्री शीला दिक्छित सेहो कल जोड़ी क इन्द्र भगवान सं त्राहि -माम के गोहार क रहल छति
पता नहि चेरापूंजी में लोक सब कोना क रहैत हेतैक .
दिल्ली में केहनो,पानि -बतास ,या सित्लहरी कियक ने होऊ ,अहि ठामक लोक के दिनचर्या नहि रूकैतछैक .तैं सब के अपन-अपन ठाम पर क बिदा क
अपना लेल एक कप गरमा -गरम चाह बनौलहूँ मोन त ओही चाह संगे कचरी खै के होइत छल मुदा बनब के आलस्य दुआरे अनठा देलियैक

Saturday, September 4, 2010

पेटक बात

काल्हि खन सहलछलहूँ .तैंभोरे सं सब खाय लेल कह्यलागल मुदा हम सब के बात अनठाक सब के ऑफिस कॉलेज बिदा केला के बाद अपना लेल तप्पत भात आ खूब चहट गर तीमनबना क जा खा नहीं लेलहुं ता देह में किछु सक्के नहि बुझाइत छल .जाँ सबहक सामने इ काज केने रहिति यई तसब बद्द बात कही तै कियो सुगर बध्वा के धमकी देत त कियो गैस क नाम सं डरबिते
गाम
- घर सं बाहर रहला सं ई सब फेदा छैक ओना नुकसानों कोनो कम भारी नहि छैक अप्पन डेरा में मरितो रहू त कियो देखन्हार-बुझ्न्हार नहि