Tuesday, May 15, 2012

hamari shilong yatra

जब से काका की पोस्टिंग शिलोंग हुई थी ,हम वहां जाने का मन बना रहे थे ,लेकिन किसी न किसी वजह से हमारा प्रोग्राम बन नहीं पा रहा था .अंततः इस अप्रैल के दुसरे सप्ताह में हमारा कार्यक्रम बन ही गया
हम इसलिए भी शिलोंग जाना चाहते थे क्योंकि ,हमारा रास्ता गुवाहाटी हो कर था और वहीँ देवी कामख्या का प्रसिध्ह मंदिर भी है .एक पन्थ दो काज सिध्ह हो रहा था .कामरूप कामख्या का वर्णन मैंने कई किताबों में पढ़ रखा था और फिर हमारे मिथिलांचल में तो इस बारे में कई किम्वदंतियां भी प्रचलित थी की वहां की औरतें बड़ी मायावी होती हैं ,जो बाहरी आदमियों को अपने वश में कर के भेड़ा बना देती हैं .जिसके चलते जो एक बार रोजगार करने आसाम जाता था ,लौट कर नहीं आता था .लोक गीतों में प्रचलित "मोरंग"यही आसाम था .
वहाँ की औरते सचमुच मोहक होती हैं .अपने पारंपरिक पोशाक में तो और भी मोहक लगती हैं.
हाँ!मंदीर प्रांगन में ढेर सारेभेद भी थे .शायद वे सारे बिहारी मजदूर ही हों
मंदिर की बनावट खास करके उसका गर्भ गृह ,रोमांचित करता है .देख कर सही में लगता है की कभी यह औघड़ों का उपासना स्थल रहा होगा .वैसेअभी तो पुरे मंदिर मेबिजली की व्यवस्था है .लेकिन गर्भ गृह में बल्व नहीं लगा कर मंदिर की रहस्यात्मकता को बरकरार रखा गया है ,जिससे एक अलौकिक श्रधा का माहौल बनता है .
गुवाहाटी जा कर अगर गेंड़ों को पास से नहीं देखतो क्या देखा .हम भी उसे उसके अभ्यारण्य में जा कर देखना चाहते थे .काका ने हाथी का इंतजाम पहले से करवा के रख्हाथा हमारे लिए हाथी की सवारी भी नया अनुभव था
(जीवन सार्थक किया )पता नहीं गेंडे जैसे निरीह प्राणी को देखने के लिए लोग हाथी पर चढ़ कर क्यों जाते हैं ?
इतनी मोटी चमड़ी, इतना विशाल शरीर लेकिन हाव-भाव एवं मुख मुद्रा से बड़े ही मासूम और भोले दीखते हैं
फिर शाकाहारी भी होते हैं उन्हें तो और भी पास से देखा जा सकता है मैंने काका से पूछा नहीं
जो भी हो मुझे तो बड़े प्यारे लगे शायद बनैले सूअर जो उनके आसपास घूमते रहते हैं इस वजह से पर्यटकों को हाथी पर से दिखाया जाता हो उनकी इतनी ब ड़ीसंख्या देख कर लगा कहीं आसाम की मायावी नारियां मर्दों को भेड़ों की तरह गेंडा तो नहीं बनती होंगी ?
शिलोंग और पहाड़ी शहरों किअपेछा ज्यादा सुन्दर है .क्योंकि यहाँ के घर भी सुन्दर-सुन्दर हैं .घरों को फूल के गमलों से सजा के रखा गया है .शहर साफ -सुथरा भी है शायद ज्यादा बारिश की वजह से गन्दगी तुरत धुल जाती होगी .घाटियों में शहर की सघन आबादी बसी हुई है लेकिन रात के वक्त इनके घरों की बत्तियां जुगनू के समान जगमगाती लगती हैं.ऊँची- नीची सड़के ,जो कुछ ज्यादा ही ऊँची-नीची हैं .तभी वहां के लोग दुबले पतले हैं कोई भी शायद ही मोटा होता हो .
मेघालय के बारे में जैसा सुना था वैसा ही देखा ,सारा काम काज प्रायः औरतें ही करती हैं .मांस काट कर बेचने जैसा बर्बतापूर्ण काम भी औरतें बड़े आराम से करती हैं वहाँ के फेंसी बाजार जैसी जगह को छोड़ कर सारा व्यापर औरते ह़ी सम्हालती हैं गली मोहल्लों में औरतों का ह़ी बोल बाला था .महिलाएं सुन्दर तो होती ह़ी हैं वो अपने रख रखाव का पूरा ध्यान भी रखती हैं.देख कर अच्छा लगता है .
बरसात का शहर चेरा पूंजी लेकिन हम गए तो बारिश नहीं हुई जिस ने भी तब फोन किया यही पूछा ,वहाँ तो पानी बरस रहा होगा ?बरसात नहीं होने के कारण ह़ी हम लोग,सुन्दर -सुन्दर जल प्रपात देख पाए .
गंगटोक नहीं देख पाने के अफ़सोस के साथ हम लोग वापस लौट आये .

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