Wednesday, August 14, 2013

उफ़ ये बच्चे!

अब मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं. जब वे छोटे थे तो उन्हें पालने  में जो भी मशक्कत उठानी पड़ी हो अब वो सारा कुछ याद नहीं है और तब उम्र के हिसाब से स्फूर्ति भी थी. बेटियां शांत स्वभाव की थीं लेकिन उनके उलट बेटा, सारी कसर पूरी कर देता था. हद से ज्यादा चंचल .दिन में थोड़ी देर के लिए भी नहीं सोता और अगर गर्मियों की उस प्रचंड दुपहरी में मेरी आँख लग गयी तो किसी एक सामान का नुकसान निश्चित था. चाहे ऊन  के गोले से क्रिकेट खेलने के चक्कर में पूरा बुना हुआ पल्ला उघडा मिलता था या फिर शर्बत बनाने में पूरी की पूरी शर्बत की बोतल खाली हो जाती थी. देखते ही देखते वे कब बड़े हो गए, पता ही नहीं चला. अब जब छोटे बच्चों को देखती हूँ तो मुझे अपने बच्चों का बचपन याद आ जाता है. 

मेरे घरेलु कामों में सहायता करने वाली रिंकू के बच्चे अभी छोटे हैं, कभी-कभार वो अपने बच्चों को ले कर आती है, उसका भी लड़का, उम्र होगी यही तीन –चार साल,  चेहरे से ही चंचल दिखता है, लेकिन अपनी माँ की कड़ी नजरों के डर से चुपचाप टी.वी.के सामने बैठा  रहता है. हाँ जब भी बिस्कुट देने की बारी आती है उसे सबसे अधिक चाहिए होता है. मुझ से जिद करके उसे जितना लेना हो मांग ही लेता है. उस समय माँ की ततेरती आखों का डर भी उसे रोक नहीं पाता. मेरी उससे पटती है क्योंकि मैं उसे शैतानी नहीं करने पर ईनाम देती हूँ - खुदरा पैसों की एवज में मिले टॉफी


जो भी हो, अकेले मेरा उस से कभी पाला नहीं पड़ा. कल की बात है, रिंकू अपना मोबाईल मेरे ही यहाँ छोड़ गयी, अपने घर पहुँच कर जैसे ही उसे मोबाईल की याद आई, उसने बेटे को  भेजा. मुझे कहीं बाहर निकलना था मैं जाने की तैयारी में थी. तभी वो आया. घर में  घुसते ही उसने कहा, आंटीजी आपने  टी. वी. क्यों बंद कर रखा है? मैं कुछ कहती  तब तक उसने सोफे पर चढ़ कर टी. वी. ऑन कर दिया. फिर  उसकी निगाहें टेबल पड़े मेरे पर्स पर पड़ी मैंने पर्स में डालने के लिए  रूपये बाहर रखे थे. वो सारे रूपये उठा कर मेरे पास ले आया कहने लगा, लो अपने रूपये! कोई चुरा न लेगा? मुझे हंसी आ गई. मैंने झट से उसके हाथों से पैसे लिए और सोचा, आज तो बच ही गए. उससे कहा, अरे! जल्दी घर जाओ. लेकिन तब तक वह लेपटॉप के पास पहुँच कर उस पर हारमोनियम बजा चुका था.मैंने जोर से उसके हाथों को पकड़ कर उसे वहाँ से हटाया और लेपटॉप को सही करने लगी, तभी किचन से आवाज आई, आंटीजी, बिस्कुट लूँगा. जब तक मैं दौड़ कर किचन पहुंची वो बिस्कुट का डिब्बा उतार कर अपनी जेबों में बिस्कुट भर रहा था. इस चक्कर में कई सारे डिब्बे खुले पड़े थे. मुझे डर था गैस चूल्हे का, कहीं उसे न कुछ कर बैठे. हुआ भी वही, गैस चूल्हे का स्विच ऑन करके कहने लगा आंटीजी, देखो मुझे गैस जलाना भी आता है. बर्नर से गैस निकलने लगी. मुझे बेहद गुस्सा आ गया, झटपट गैस ऑफ करके कस के उसके कान पकड़े और किचन से उसे बाहर ले आई.


फिर क्या था, लगा गला फाड़ कर रोने! मेरी तो हालत खराब! वो रोये जा रहा था. मेरी कोई बात नहीं सुन रहा था. मुझे बुरा लग रहा था ये सोच कर की उसकी माँ क्या सोचेगी. अंत में हार कर मैंने उसे पांच रूपये का लालच दिया. वैसे भी, दो रूपये वो मुझ से हरदम माँगा करता था लेकिन उसकी माँ ने मना कर रखा था कि उसे पैसों की लत लग जायेगी. आखिरकार पैसे देख कर वो चुप हुआ और चला गया. उसके जाने के बाद मैं धड़ाम से सोफे पर बैठ गयी. उफ़ ये बच्चे!

2 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (15-08-2013) को "ब्लॉग प्रसारण- 87-स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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