सत्यम वेंटिलेटर पर है ।जीवन दान के सारे द्वार बन्द हो चुके हैं बस ,एक द्वार है जो थोड़ा। सा खुला है,वो ईश्वर का का द्वार ।हम सभी उसी चौखट पर सर पटक रहे हैं , इस उम्मीद पर की उनके द्वार से कोई खाली नही जाता ।वही कोई चमत्कार करें की हमारा गोलू मोलु सा लाड़ला वापस आ जाये।
Tuesday, November 3, 2015
Friday, April 3, 2015
गांव ,आज- कल
अरसों
बाद कुछ दिनों के लिए गांव में रहने का अवसर मिला .मन में गांव कि एक मीठी
स्मृति बसी हुई थी .बाबु, हमारे बड़े दादा जी उनकी नोइस {सुंघनी }के महक से भरी, बड़ी सी रजाई .जिस में घर के सारे बच्चे समा जाते थे .कुछ उनकी गोद में बैठते थे
बाकि आस-पास उनसे सट के घुसे रहते थे .बाबु सभी
को समेट कर ,कभी”साते भवतु“रटवाते थे तो कभी कोई संस्कृत का श्लोक,,निरंतर श्रीमन नारायण-नारायण
का जाप उनके.पोपले मुख की निश्चल हंसी ,हमारी शरारतों पर भी उनका खिलखिलाना अभी भी
कानो में गूंजते हैं .हमारे दादा जी गुस्सैल स्वभाव वाले थे .ऐसे में उनकी बड़ी सी
रजाई ,हमारी रक्षा कवच का काम करती थी.स्नेहमयी दादी माँ ,मिठाई बाँटने में भले
अपने पोतों को सारी मिठाई बाँट आती थी या वे उच्चके पोते ,उनसे झपट लिया करते थे .कभी-कभी
बहुओं पोतियों के लिए कुछ भी नही बचता था लेकिन उनके स्नेह की मिठास अभी भी
स्मृतियों में घुली हुई है .
गांव अब वो गांव नही रहे .गांव के मूल
स्वरूप में जिस तेजी से बदलाव आया है ,देख
कर मन थोडा क्षुब्द हो उठा .पता नही क्यों ,हम खुद तो आधुनिक बनने की होड़ में शामिल हुए रहते हैं लेकिन गांव ,हमे
पुराने रूप का चाहिए होता है ,दरअसल परिवर्तन रहने ,पहनने में आए तो अच्छी बात है लोगों
का जीवन स्तर बढ गया है .हर मकान पक्के का है .दालान पर प्राय्ह दो पहिया या
चारपहिया है.लेकिन जिस समाजिकता ,सौहाद्र शुद्धता के लिए गांव जाना जाता था वही
नदारत हो है .
मै बहुत पुराने दिनों की बात नही
कर रही हूँ ,यही कई बीस से पच्चीस साल पहले तक गांव के घर चौकोर आंगन वाले हुआ
करते थे ,आगे बरामदे के लिए जगह छोड़ के ,लाईन से कमरे बने रहते थे .अगले हिस्से
में सड़क की तरफ से दालान हुआ करता था .दालान के दोनों छोर पर कमरे होते थे जिससे आंगन
में प्रवेश किया जा सकता था .फिर भी घर के बगल से एक संकीर्ण रास्ता छोड़ा जाता था
जिससे तरकारी बेचने वालियां घुसा करती थी .आंगन के दुसरे छोर पर भी रास्ता था जो
बाड़ी की ओर जाता था वहीं चापानल था स्नानघर इत्यादि था वही रास्ता बाहर की ओर निकल
जाता था किसी में कोई दरवाजा नही होता था न उसकी जरूरत समझी जाती थी कोई भी
किसी के आंगन में मुंह उठा के आ-जा सकता था .जहां तक मुझे याद है गांव के अघिकता घर
इसी खांचे के बने होते थे। लेकिन अब जो नए मकान बन रहे है वे सारे किसी किले से कम नही
होते,हाते की ऊँची घेरा बंदी करके मुख्य द्वार पर ग्रील लगा दिया जाता है ,जिसमे
दिन में भी ताले जड़े रहते है ,गृह स्वामी ग्रिल के अंदर अपने धन के अहंकार में चूर
,किसी के आने की प्रतीक्षा में बैठे रहते
हैं कोई किसी के यहाँ नही जाता सबके अपने अपने किले है जिसमे सबों ने अपने
आप को कैद करके रखा है .वो खुलापन ,वो सादगी ,वो भाईचारा जिसके कारण गांव ,गांव जैसा लगता था . वो मिट्टी की सोंधी महक ,जब आंगन को मिट्टी और गोबर से लीपा जाता था मिट्टी की महक की जब मैंने चर्चा की तो किसी ने बड़ी तीखी टिप्पणी की ,कहा, खुद तो आपलोग अब आलीशान अपार्टमेंट में रहते हैं और गांव में आप मिट्टी की महक चाहते हैं .गोबर से आँगन कौन लीपे ,घरेलू काम की सहायता के लिए तो आदमी लोग मिलते नही ,फिर ये कौन झंझट मोल ले .पर्व त्योहारों में भी यही भावना बनी रहती है. लोग कम ही निकलते है .गाहे बगाहे मिल लिए
तो ठीक वरना किसी को किसी की परवाह नही है .उधर युवा वर्ग टी.वी.के पीछे पागल है.प्रतिभावान
बच्चे आगे की पढाई के लिए जैसे तैसे निकल जाते हैं बचे हुए दिग्भ्रमित युवा
बिरादरी के दांव पेंच में अपनी उर्जा को व्यर्थ कर रहे हैं.टी.वी. में दिखाए जा रहे जीवन स्तर,,फैशन की नकल ने अविभावको का जीना मुहाल कर रखा है .लड़कियों का
एक मात्र लक्ष शादी होता है .ब्यूटीपार्लर वालियों के पौ बारा हैं. .लडके अपने
शौक की पूर्ति के लिए दहेज का सहारा लेने में जरा नही झिझकते हैं .गावों की यह स्थिति देख कर
बेहद हताशा होती है .मन में यही आया इससे तो शहर अच्छा . !
Monday, January 19, 2015
पहाड़ों का आमंत्रण
जब पर्यटनकी बात चली तो ढेरों नाम जेहन
में उभरे ,कहीं भीड़-भाड़ की वजह से तो कहीं आवागमन की असुविधा के कारण कुछ तय कर
पाना मुश्किल लग रहा था , तब अचानक मुझे अल्मोड़ा का नाम सूझा. शिवानी जी को मैंने
जब से पत्रिकाएँ पढनी शुरू की तब से पडती रही हूँ .धर्मयुग ,साप्ताहिक हिदुस्तान
,सारिका में अक्सर उनकी कहानियाँ उपन्यास छपते थे .
उनके लिखने की अदभुत शैली से ,मै ही नहीं सब
लोग उनकी कहानियों ,उपन्यासों के दीवाने थे. घर में साप्ताहिक हिदुस्तान और धर्मयुग
पत्रिका आती थी , कौन पहले पढेगा इसके लिए कभी कभी छीना –झपटी की नौबत आ जाती थी .
किसी कथाकार के कथादेश की यात्रा
करना इतना रोमांचक होगा मुझे इसका अनुभव नही था .मै कहूँ की मुझे सब कुछ
जानी-पहचानी चीजें लग रही थी तो कुछ गलत नही होगा.ऐसा चित्र लिखित सा वर्णन चाहे
वो सड़क की हम सफर पगली नदी हो या
देवदार के ऊँचे पेड़, जिसे उन्होंने अनंत काल की तपस्या में लीन सन्यासी कहा है
.रास्ते में पड़ने वाली चाय की दुकाने आम
सी थी चाय भी बढिया पिलाते थे .लेकिन मुझे
तो शिवानीजी की कथाओं वाली चाय की दुकान
की तलाश थी आखिर वो मुझे अल्मोड़ा शहर के छोटे से बाजार में दिख गई .छोटी सी दुकान ,कोयले के धुएं से काली पड़ी दुकान ही नही बिस्कुट के मर्तबान , दीवार पे टंगे
वर्षों पुराने कैलेण्डर ,कालिख की वजह से कुछ पता नही चल रहा की उनमे किस देवता की
तस्वीर होगी लेकिन मामला देवताओं वाला था इसलिए उन्हें हटाना लाजमी नही रहा होगा .
कोयले की अंगीठी पर चढा अलमुनियम का सौसपेन,जिसके बाहर कोयले की कालिख को साफ करना
छोड़ दिया गया था .हम जब गए तो चाय चढ़ी हुई थी ,ढेर सारी गोल दाने वाली चाय पत्ती
को कडछी से औटा जा रहा था ,दुकान के अंदर एक बेंच लगी थी वैसे स्थानीय लोग बाहर
खड़े खड़े चाय पी रहे थे .मै अंदर घुस कर बेंच पर बैठ गयी .साथ के लोगों ने मुझे
हैरानी से देखा मैंने बिना लोगों की मर्जी पूछे चाय का ऑडर दे दिया .शीशे के छोटे ग्लासों
में चाय आ गयी .चाय पीने में अच्छी थी सो सबों ने मजे ले कर चाय पी .
तभी ,दुकान के सामने एक प्रौढ व्यक्ति आ
रुके ,तीन इंच की वर्गाकार ,मोटी सी शिखा ,जिसके अत में गांठ थी .बदन पर शर्ट,
मैली सी धोती .शायद वो भी चाय पीने रुके थे .मुझे उनके उपन्यासों में वर्णित वैद
ज्यु मिल गए थे .गढवाली ब्राह्मणों का हुबहू वर्णित व्यक्ति सामने खड़ा था .मैंने
उन्हें झुक कर प्रणाम किया ,उन्होंने थोडा अक्च्काते हुए स्वीकार किया .फिर हम लोग
आगे बढ गए .शाम होने को थी ,हमे काफी कुछ देखना था .
बरसात के दिन थे ,इलाके
में ऑफ सीजन चल रहा था ,इसलिए काफी कम भीड़ थी .अच्छा था .यहाँ शिमला -नैनीताल से
कम लोग आते हैं,जबकि प्रकृति यहाँ अपने सुन्दरतम रूप में दिखती है ,जितना उपर जाओ
,उतना प्रकृति का पवित्र स्नेह मिलता है .इसमें यहाँ के सीधे -साधे ,भले लोगों का
भी प्रभाव है .कर्मठ और ईमानदार लोग
.पर्यटकों को लूटने का काम नही करते .
यहाँ काफी गरीबी है ,अपने रोज की जरूरतें पूरी
करने में उनका दिन बीत जाता है,सुन्दर गोरी चिट्टी गढवाली औरतें तराई में जलावन के लिए लकडियाँ चुनते दिख जाती हैं कभी सर पे पानी भर कर लाती हुई सब की नाक में बड़ी सी नथ.जो उनके सौंदर्य को बढता है .मैंने पढा था ,ये नथें,उनकी हैसियत बताती है अमीरों की बहुएं ,ज्यादा बड़ी नथ पहनती है .मै उनकी न्थों को गौर से देखती थी .हाँ ,मुझे शिवानी जी की उन ,तीखे नैनों वाली रहस्यमयी नायिकाओं की तलाश थी जो छलावे की तरह आती थी और अंत में न जाने कहाँ चली जाती थी .शायद इसलिए मुझे नही मिली .
.पर्यटकों के आने से उन्हें कोई खास फायदा नही होता
.बाहर की बड़ी पार्टी होटल खोल के मोटा फायदा उठती है .स्थानीय लोगों को बेयरे या
ड्राइवर के रूप में रोजगार मिलता है .फिर भी ये अपनी धुन में मग्न रहते हैं . कभी
फिर मौका मिले तो मै दोबारा यहाँ आना चाहूंगी .
कथा यात्रा शिवानी जी की याद में
जब पर्यटनकी बात चली तो ढेरों नाम जेहन
में उभरे ,कहीं भीड़-भाड़ की वजह से तो कहीं आवागमन की असुविधा के कारण कुछ तय कर
पाना मुश्किल लग रहा था , तब अचानक मुझे अल्मोड़ा का नाम सूझा. शिवानी जी को मैंने
जब से पत्रिकाएँ पढनी शुरू की तब से पडती रही हूँ .धर्मयुग ,साप्ताहिक हिदुस्तान
,सारिका
उनके लिखने की अदभुत शैली ,मै ही नहीं सब
लोग उनकी कहानियों ,उपन्यासों के दीवाने थे. घर में साप्ताहिक हिदुस्तान और धर्मयुग
पत्रिका आती थी , कौन पहले पढेगा इसके लिए कभी कभी छीना –झपटी की नौबत आ जाती थी .
किसी कथाकार के कथादेश की यात्रा
करना इतना रोमांचक होगा मुझे इसका अनुभव नही था .मै कहूँ की मुझे सब कुछ
जानी-पहचानी चीजें लग रही थी तो कुछ गलत नही होगा.ऐसा चित्र लिखित सा वर्णन चाहे
वो सड़क की हम सफर वो पगली नदी हो या
देवदार के ऊँचे पेड़, जिसे उन्होंने अनंत काल की तपस्या में लीन सन्यासी कहा है
.रास्ते में पड़ने वाली चाय की दुकाने आम
सी थी चाय भी बढिया पिलाते थे .लेकिन मुझे
तो शिवानीजी की कथाओं वाली चाय की दुकान
की तलाश थी आखिर वो मुझे अल्मोड़ा शहर के छोटे से बाजार में दिख गई.छोटी सी दुकान
कोयले के धुएं से काली पड़ी दुकान ही नही बिस्कुट के मर्तबान , दीवार पे टंगे
वर्षों पुराने कैलेण्डर ,कालिख की वजह से कुछ पता नही चल रहा की उनमे किस देवता की
तस्वीर होगी लेकिन मामला देवताओं वाला था इसलिए उन्हें हटाना लाजमी नही रहा होगा .
कोयले की अंगीठी पर चढा अलमुनियम का सौसपेन,जिसके बाहर कोयले की कालिख को साफ करना
छोड़ दिया गया था .हम जब गए तो चाय चढ़ी हुई थी ,ढेर सारी गोल दाने वाली चाय पत्ती
को कडछी से औटा जा रहा था ,दुकान के अंदर एक बेंच लगी थी वैसे स्थानीय लोग बाहर
खड़े खड़े चाय पी रहे थे .मै अंदर घुस कर बेंच पर बैठ गयी .साथ के लोगों ने मुझे
हैरानी से देखा मैंने बिना लोगों की मर्जी पूछे चाय का ऑडर दे दिया .शीशे के छोटे ग्लासों
में चाय आ गयी .चाय पीने में अच्छी थी सो सबों ने मजे ले कर चाय पी .
तभी ,दुकान के सामने एक प्रौढ व्यक्ति आ
रुके ,तीन इंच की वर्गाकार ,मोटी सी शिखा ,जिसके अत में गांठ थी .बदन पर शर्ट,
मैली सी धोती .शायद वो भी चाय पीने रुके थे .मुझे उनके उपन्यासों में वर्णित वैद
ज्यु मिल गए थे .गढवाली ब्राह्मणों का हुबहू वर्णित व्यक्ति सामने खड़ा था .मैंने
उन्हें झुक कर प्रणाम किया ,उन्होंने थोडा अक्च्काते हुए स्वीकार किया .फिर हम लोग
आगे बढ गए .शाम होने को थी ,हमे काफी कुछ देखना था .
बरसात के दिन थे ,इलाके
में ऑफ सीजन चल रहा था ,इसलिए काफी कम भीड़ थी .अच्छा था .यहाँ शिमला -नैनीताल से
कम लोग आते हैं,जबकि प्रकृति यहाँ अपने सुन्दरतम रूप में दिखती है ,जितना उपर जाओ
,उतना प्रकृति का पवित्र स्नेह मिलता है .इसमें यहाँ के सीधे -साधे ,भले लोगों का
भी प्रभाव है .कर्मठ और ईमानदार लोग
.पर्यटकों को लूटने का काम नही करते .
काफी गरीबी है ,अपने रोज की जरूरतें पूरी
करने में उनका दिन बीत जाता है,.पर्यटकों के आने से उन्हें कोई खास फायदा नही होता
.बाहर की बड़ी पार्टी होटल खोल के मोटा फायदा उठती है .स्थानीय लोगों को बेयरे या
ड्राइवर के रूप में रोजगार मिलता है .फिर भी ये अपनी धुन में मग्न रहते हैं . कभी
फिर मौका मिले तो मै दोबारा यहाँ आना चाहूंगी .
Monday, October 13, 2014
दस्तक
मौत दस्तक दे रही है.
मै तक़दीर वाली हूँ की ,
मै तक़दीर वाली हूँ की ,
मौत दस्तक दे रही है
यूँ मौत आती है ,चुपके से
हमें साथ ले जाती है .
हमारे जाने के बाद ‘
लोग ढूढते हैं बहाने
यूँ अचानक जाने का .
मै तकदीर वाली हूँ
मौत दस्तक दे रही है .
अचानक किसी के जाने के बाद ,
लोग बनाते हैं बातें ,
ये किया होता,वो न कर सका .
मै तकदीर वाली हूँ
मौत दस्तक दे रही है .
मुझे मोहलत मिली है .
निपटाने हैं कई काम ,
कुछ देना है, कुछ पावना है .
मै तक़दीर वाली हूँ .
मौत दस्तक दे रही है .
कुछ रिश्ते हैं ,कुछ नाते हैं
.
कुछ बंधन हैं ,कुछ गांठें है
छोड़ रक्खा था उन्हें ,दोराहे
पे .
संशय था ,द्वंद था .हाँ या ना
?
मै तक़दीर वाली हूँ
मौत दस्तक दे रही है .
खुल
चुकी हैं गांठें ,अब कोई बंधन नही ,
सीधा रास्ता है ,मंजिल करीब है
.क्योंकी ,
मौत दस्तक दे रही है .
Wednesday, September 3, 2014
रोना तो बनता है .
ईश्वर ने सबके लिए एक कोटा सिस्टम लागू कर रखा है .यह सब चीजों पर साबित होता है चाहे वो खुशी हो ,गम हो, मिठाई हो, तेल-मसालेदार भोजन हो, वगैरा वगैरा ............अगर आप इन चीजों को थोडा थोडा करके उपभोग करेंगे तो जीवन भर इन्हें पाएंगे .पैसे की ही बात करें,कैसे-कैसे अमीर कंगाल बन जाते हैं खैर ,इस सिस्टम की मार मुझ पर कैसी पड़ी बताती हूँ..जीवन के शुरूआती दिनों से ही मुझे रोना धोना बिलकुल पसंद नहीं था.बल्कि जरा सी बात पर रो देने वाले लोगों पर मै हँसती थी .बाबू जी हमे फिल्मे खूब दिखाते थे .सिनेमा हॉल में पुतुल दी, मरने- धरने वाले सीन में हिचकियाँ ले कर रोती थी .हॉल से बाहर आने पर हम रो-रो कर लाल हुई नाक देख कर हंसते थे .सिर्फ हम ही नहीं हॉल से निकलने वाले सब लोग उसकी ओर देखते जाते थे .सच कहूँ किसी -किसी सीन पर मेरी भी आखों में आंसू भर आते थे.लेकिन अपनी इमेज खराब ना हो जाये इस डर से ,हॉल के अँधेरे का फायदा उठा कर छुपा कर आंसू सुखा लेती थी.
फिर रोने का एक जबर्दस्त इवेंट आया .पुतुल दी का दुरागमन.{गौना}.पुतुल दी की शादी और दुरागमन चूँकि गांव से हुई थी इसलिए रोने –धोने का कार्यक्रम खूब चला.मैथिलों में लडकियां ससुराल जाते समय गा-गा कर रोती हैं .माँ गे माँ ,हम तोरा बिन कोना क रहबौ गे माँ ,काकी ये काकी ,हमरा बिसरब नहि ये काकी ,बाबू जी यौ बाबू जी हमरा जल्दी मंगवा लेब यौ. हर रिश्ते के लिए अलग लाइन .पूरी जिंदगी शहर में रहने वाली पुतुल दी !,पता नहीं उसने इतना अच्छा परफोरमेंस कैसे दिया.उसकी शादी में इतने लोग आए थे की मेरी बारी नही आई .वैसे भी उस समय मेरे मन में उसके लिए रोने की भावना एकदम नही थी.एक तो वो मुझ से चार साल बड़ी थी .फिर उसका और मेरा ग्रुप भी अलग था .माँ कभी-कभी उसे मुझे कहीं साथ ले जाने के लिए कहती भी थी तो वो मना कर देती थी.मुझे बुरा नही लगता था .क्यों की उसके खेल लड़कों वाले थे,खो-खो कब्बडी ,पिट्टो जैसे खेल. मेरा गुड़ियों का संसार था .
पर उस दिन पता नही क्यों ,मुझे बड़ी जोर की रुलाई आने लगी.अपने नही रोने-धोने वाली लड़की की इमेज खराब होने की बड़ी चिंता थी .मै दौड कर सोने वाले कमरे में घुस गयी और कोने में बिस्तर के ढेर पर बैठ कर फूट –फूट कर रो पड़ी.किसी को फुर्सत नही थी मुझे चुप कराने की ,हाँ मुझे लगा लोग खिडकी से झांक रहे थे .लेकिन उस वक्त माहौल वैसा था तो रोना तो बनता था.
फिर मेरी शादी, दुरागमन की बारी आई .माँ,बाबू जी ,भाई –बहन.अपने घर को छोड़ कर ,एकदम नए लोगों के घर जाना और वहीं रह जाना .मुझे सोच कर घबराहट हो रही थी.मै दिल से रो रही थी .मेरा परफोरमेंस अच्छा नही हुआ था.लेकिन कामा दीदी {पीसी माँ }गा-गा कर ,मेरे गले लग कर खूब रोइं
बाबू जी का अचानक ,समय से पहले गुजर जाना.मेरे लिए बेहद त्रासद था. एक रोने- धोने को नापसंद करनेवाली को जीवन भर उनकी याद रुलाएगी.क्यों की वो थे ही इतने अच्छे.मुझे हर मौके पर उनकी याद आती है .उनके जाने की खबर मिलने के काफी देर बाद हम उन तक पहुंच सके थे.उन्हें बर्फ पर रखा गया था .लोग कहते हैं ,मरने के बाद अपने लोगों से भी डर लगता है.ऐसा कुछ भी नही हुआ.गाड़ी से उतर कर ,मै दौड कर उन तक पहुंची.उनके बर्फ से ठंडे पांवों पर अपना सर रख कर रोती रही .मै वहाँ से हटना नही चाह रही थी लेकिन मुझे लोग हटा कर अंदर ले गए. ऐसे में रोना तो बनता ही बनता है .
Friday, August 8, 2014
परिवर्तन ,एक पडाव
हमने अपना घर बदल लिया है पहले वाला छोटा
था. ये काफी बड़ा सा है.वो घर छोटा भले ही था लेकिन उसमे सुविधाओं की कोई कमी नहीं
थी .दो मंजिला घर था हम ऊपर रहते थे.इसलिए छत हमारी थी .छत मेरी पसंदीदा जगह थी
.घर के निर्जीव सामान चाह वो कितने कलात्मक क्यों न हों ,रोज –रोज एक ही सामान
देखते देखते मन ऊब जाता है. फर्नीचर की जगह बदलने से कुछ ही दिनों के लिए नयापन आता
फिर वैसे का वैसा.
वहाँ मैंने छत पर ढेर सारे
गमले इक्ठा कर रखे थे .चार पांच रंगो के अडहुल ,कनैल ,श्रीन्हार ,एलोविरा का तो एक
बार अगर लग गया फिर इतनी तेजी से बढ़ता है की फिर बार बार उसे निकाल कर फेकना पड़ता
है इन अतिरिक्त पौधों के लिए पुराने गमले ,बाल्टी सब में मिट्टी डाल कर सहेजना,
मेरा समय बड़े आराम से कट जाता था.बच्चों के बाहर चले जाने के बाद का जो खालीपन सा
पैदा हो गया था उसे भरने में मेरी बागवानी के शौक ने बड़ा सहारा दिया .
छत पर मैंने एक अलग दुनिया बसा रखी
थी.मौसम का नया फूल मुझे रोमांचित कर देता था.कागजी निम्बू के पौधे की मैंने दो साल तक सेवा की ,तब उस पर
फूल आए.फिर तो मेरा मन करता था ,हर घर आने जाने वालों को निम्बू की कलियाँ जरूर
दिखाउ.
सरकारी क्वाटरों की जर्जर
हालत ,कॉलोनी के आस-पास की गंदगी ,दुर्गंध करता जमा हुआ पानी ,अंततः हमे कोलोनी छोडना
पड़ा किसी कोलोनी में रहने के अपने मजे हैं .आपके प्रति उनका सरोकार ,हर बात की
जिज्ञासा ,सुख दुःख में साथ देने की प्रवृति .हमे कभी अकेलेपन का एह्शास नही होने
दिया .
अब हम एपार्टमेंट में आ गए हैं .क्वाटर
के मुकाबले ये घर काफी बड़ा है.खिड़कियां बड़ी -बड़ी हैं और उन में शीशे लगे हैं इससे
पूरा घर प्रकाशित और हवादार है .
अपार्टमेंट की दुनिया भी अजीब होती
है .भीड़ में अकेला वाली कहावत इसके लिए काफी सही है .अगल-बगल ढेर सारे लोग रहते
हैं.सुबह से आवाजे आनी शुरू हो जाती हैं .सटे-सटे घर हैं ,कभी-कभी तो ऐसा लगता है
कोई हमारे घर में बोल रहा हो.लेकिन ये सच है की किसी को आपके घर में झाँकने की
फुर्सत नही है.सामने वाले फ़्लैट में युवा दम्पति रहते हैं दोनों कामकाजी लोग हैं
सुबह निकलते हैं उनके ताला बंद करने की आवाज से मै समझ जाती हूँकि वो जा रहे हैं
फिर शाम को उनका घर खुलता है.तेज म्यूजिक बजता रहता है इसलिए किसी के बोलने की
आवाज सुनाई नहीं देती.दाहिने ओर एक कम उम्र माँ है पति शायद सारे दिन घर से बाहर
रहता है दो छोटे बच्चे हैं एक ने स्कूल जाना शुरू ही किया है,वो कभी एक को पढाती
कभी दूसरे को पुचकारती है लेकिन घरके काम का बोझ फिर दो छोटे बच्चों को सम्हालना
ऐसे में गुस्सा बड़े पर उतरता है पीटनेकी आवाज से मै व्याकुल हो जाती हूँ .लगता है
छोटे बच्चे को मै अपने पास बुला लूँ ,माँ का बोझ कुछ तो हल्का हो जाएगा .एक
है दलजीत .उसकी मम्मी सारे दिन उसे पुकारती रहती है.उठ दलजीते ,नास्ता कर
दल्जीते,अब स्कूल के लिए तैयार हो जा दलजीते,होमवर्क क्यों नहीं करता दलजीते ,टीवी
बंद कर दलजीते. लेकिन ये दलजीत भी कोई चीज है.मम्मी लाख पुकारे ,करता व्ही है जो
उसका मन .जी करता है ,उस नटखट दलजीत से कहूँ क्यों अपनी मम्माको इतना तंग करते हो?हमारे
उपरवाले फ्लोर पर शायद एक वृद्धा रहती है ,चलने फिरने से लाचार,सारे दिन उनकी
फरमाइशें चलती रहती हैं .घर में शायद कम लोग है .कई-कई बार मांगने के बाद कोई पास
आता है वो तब तक दूसरी जरूरत पेश कर डालती हैं .जब उन्हें कोई पानी देने में देर
करता है मुझे बडी अकुलाहट होती है .
बहरहाल जब रहना यहीं है तो सोचती हूँ खुद उनके घर जा कर परिचय करूं .
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