Wednesday, July 11, 2018

रंगमंच से

छोटे शहरों में अभी भी मनोरंजन के नाम पर फिल्में ही देखी जाती हैं चाहे वह हॉल में हो या TV पर इसलिए दिल्ली में नुक्कड़ नाटकों से जुड़ी कोमिता से मिली तो बातों ही बातों में मैंने उससे कहा मैंने अभी तक कोई बढ़िया नाटक नहीं देखा तो उसने ज्योती डोगरा की एकल मंचन वाली  नाटक देखने को कहा यह नाटक छतरपुर में होना था शायद सारे लोग दिल्ली की कलाजगत से जुड़े    लोग थे ।पूरा माहौल काफी कलात्मक लग रहा था हल्का प्रकाश और मोमबत्तियों की जगमगाहट, हॉल  खचाखच भरा था । इस फास्ट फास्ट जमाने में इत्तमिनान से नाटक शुरू हुआ काफी लंबा  सांसों के उतार-चढ़ाव से शुरू हुआ उनका नाटक,दर्शक दम साधे नाटक देख रहे ।  विषय चाय था ।एक चाय के इतने आयाम हो सकते हैं? सोचा न था दर्शक भले अभिजात्य वर्ग के थे  लेकिन प्रसंग दिल्ली के मध्यम वर्ग से जुड़े थे।
नाटक देखने के बाद यही ख्याल आया दूध की उम्मीद में मेरे हाथ में मलाई आ गई ।नाटक के बारे में सिर्फ एक शब्द अद्भुत  ! चाहे वह अभिनय हो, परिकल्पना हो, मंच पर प्रकाश का प्रयोग हो बल्कि पूरी तरह  प्रयोग शाला  थी ।कहने को यह एकल अभिनय था लेकिन दर्शकों को साथ समेटते हुए उन्हें भागीदार बना कर । कुछ तो बात थी। पर हां, दर्शक  भी खास थे ।  विलक्षण कलाकार हैं ज्योति डोगरा जी।   एक अकेली महिला ने इतने रूप धरे , सब के सब हमारे आसपास के लोग  सारा कुछ हमारा देखा-सुना था पर सिर्फ आवाज से वैसा  माहौल बनाना कला है ।  दर्शक आत्मसात कर रहे r लगा   अगल बगल के परिवेश को खुद जिया हो बारीक से बारीक भाव भंगिमा।   चाहे औरत  की कुंठा हो,   या बुढापे की त्रासदी ,बदली आवाज़।  हमें पीछे की कुर्सियां मिली जब वह बैठ जाती थी ,हमें कुछ नहीं दिखता था उस समय में लगता था हम रेडियो सुन रहे हो रेडियो नाटक ! लेकिन फिर भी जो प्रभाव था उनकी आवाज की वजह से वह तारत्म्य बना रहा इतने सुंदर अभिनय के लिए मैं उन्हें बधाई देती हूं और शुभकामनाएं देती हूं

Tuesday, July 10, 2018

क्या फायदा ?

आधुनिकता ने हमे दो चीजों का श्राप दिया है।बाहरी तौर पर प्रदूषण और भीतर से तनाव और डिप्रेसन ।  !अब डाक्टर भी कहते पाए जाते हैं कि हर बीमारी की जड़ यही नासपीटा तनाव है। यहां तक कि फोड़े फुंसी भी ?
कैसे  ,कैसे  ,कैसे ?
वो ऐसे ,की जब कोइ राज आप अपने भीतर  छुपा कर रखते हैं ।जाहिर हैअब कम ही लोग खुले दिल के होते हैं । इसलिए हर चीज की तरह  कुछ दिनों में ये भी सड़ने लगतीं  हैंं  । शायद  यही वो  वजह हो सकती है ।
 अलबत्ता,टेंसन नही लेने का ,बिंदास रहने का,टेंसन देने का,लेने का नही ,जुमले खूब उछाले जाते हैं, दुकान में   आकाश छूती मंहगाई की बात  पर  दुकानदार झट से कहेगा आप इसकी 'टेंसन मत' लो जी ।
भैया पैसे मुझे देने हैं टेंसन कैसे न् लूं?
कुछ मामलों में टेंसन हो ही जाती है ।
आपने खूब मेहनत कर सुख सुविधा के सभी साधन  जमा कर लिए। सोचा होगा अब  चैन से रहेंगे, कोई टेंसन नही होगा।लेकिन  सुबह सुबह जब काम  वाली बाई नही आती है ,उस समय की बैचैनी याद है?
 तो पूरे दिन टेंसन टेंसन  टेंसन 
ऐसे ही आप की टेंसन की कई वजहें ड्राईवर ,गार्ड वगैरा होती हैं।
बच्चे स्कूल से लौटते हैं।
कहीं बैग,कहीं जूते, सबसे पहले टी.वी.खोल कर बैठ जाते हैं।
झुँ   झुँ   झुँ    झुंझुलाहट।
 ऐसे टेंसन के मौक़े आते रहेंगे,बस कोशिश करें इन मौके पर कूल बने रहें।बच्चे बैग,जूते फेकेंगे ही, उठाना आपका काम है।अबतक नही सिखाया तो कभी नही सीखेंगे। बच्चों के साथ आप भी  टी वी देखें।
पतिदेव शाम को शॉपिंग का वादा कर के नहीं आते हैं।
गु    गु    गु  गुस्सा।
आज नहीं तो कल उन्ही के  साथ शॉपिंग करना है। इस गलती का फायदा उठाने का मौका नहीं चूकें। आईस क्रीम की फरमाइश करें ।क्यों क्या की ओर मन को न लगाएं , गुस्से की दहक कम होगी।

Thursday, July 5, 2018

रेलगाड़ी

कहीं पर्यटन पर जा रहे हों और सफर की शुरूआत लंबी दूरी की ट्रेन से हो तो आनंद आ जाता है बिना किसी बाधा विघ्न के इतनी अच्छी नींद तो होटल के कमरे में भी नहीं आती है सुबह की चाय के लिए बैरा घंटी बजा  ही देता है न मॉर्निंग वॉक की झंझट और ना टाइम पर चाय पीने की मजबूरी इतनी चैन की नींद ट्रेन मे ही संभव होती है । खिड़की के पास वाली सीट भाग्य वालों को मिलती है अगर सामने वाले बर्थ के सहयात्री का चेहरा पसंद ना हो तो भी खिड़की वाली सीट काफी राहत देती है। रंगों की अलग-अलग छटा देखनी है तो फसल के समय में दिखती है रंग चाहे हरा हो या पीला ।सरसों के खेत का पीलापन ,रंगों के इतने बारीक अंतर आपको कहीं नहीं मिलेंगे भारत एकता में अनेकता का देश है इसका अनुभव आपको रेल यात्रा में मिलेगा ।  हर 7 कोस पर बोली और पानी बदलती है यह साक्षात दिखता है , स्थानीय लोगों की भाषा ,पहनावा आहिस्ते आहिस्ते बदल जाती है ।एक ही हिंदी उसके कई रूप सुनने को मिलेंगे हैं  आप किस इलाके में है ये वहाँ के लोगों को  देख कर समझ जाऐंगें ।लोग चढ़ते हैं उतरते हैं, बातें करते हैं नए नए चेहरों को देखना एक अलग  अनुभव प्रदान करता है ।अगर आप उत्तर भारत से दक्षिण भारत की तरफ जा रहे हों तो आश्चर्य लगता है संस्कृति  मे इतना अंतर ,धीरे-धीरे भाषा की पकड़ एकदम कमजोर होने लगती है कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता है लेकिन पैसे की भाषा सब जगह चलती  है  ।    AC के अंदर से  देखना ,लगता है जैसे हम TV देख रहे हों तेजी से बदलते दृश्य आपको पलक झपकाने का मौका नहीं देती है। सफर करने के दौरान आपको लगेगा कि भारतीय रेल भारत की लाइफ लाइन है सस्ती भी है और आरामदायक भी है।

Wednesday, July 4, 2018

कमप्यूटर बच्चे

-लगता है आजकल बच्चों की मेधा शक्ति बढ़ गई है।दिमाग कमप्युटर बन गया है। और कमपयूटर का साथ मिले तो नतीजा सामने है।बहुत बधाई रिषभ कृष्णा को, जिसने अपने पहले प्रयास में ही देश के प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक UPबहुतSC के Central Armed Police Forceठs की परीक्षा में 40वां  स्थान पाया है। पूरे भागलपुर को उस पर गर्व है ।उसकी सफलता इसलिए भी खास है कि बिना किसी प्रोफेसनल कोचिंग के  उसने खुद घर मे रह कर इसकी तैयारी की।कमरे मे वो और उसका कम्प्यूटर। यह एक तपस्या थी इसमे माँँ निभा  जी और पापा  कृष्ण मुरारी जी का भरपूर सहयोग मिला क्योंकि अच्छे कौलेज से इन्जिनीयरिंग करने के बावजूद उसनें नौकरी नहींं की। अच्छी नौकरी के मौके ठुकरा दिये , क्योंकि   उसमें देश सेवा का जज्बा था इसलिए उसने प्रशासनिक सेवा में जाने का मन बनाया । रिषभ की सफलता उन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो किसी कारणवश बाहर बड़े शहरों में  नहीं जा पाते हैं।  लेकिन अगर दृढ़ इच्छाशक्ति आपके पास हो तो आपकी सफलता को कोई रोक नहीं सकता है।

Monday, June 25, 2018

हमारी शिलौंग यात्रा

जब से काका की पोस्टिंग शिलोंग हुई ,हम वहां जाने  का मन बना रहे थे .लेकिन किसी न किसी वजह से हमा कार्यक्रम नहीं बन पा  रहा था .आखिर इस अप्रैल के  दुसरे सप्ताह  में हमारा प्रोग्राम बन ही गया .
                      हम इस लिए भी शिलोंग जाना चाहते थे क्योंकि उसका रास्ता गुवाहाटी  हो कर है और गुवाहाटी में ही जग प्रसिघ्ह कामख्या देवी का मंदिर है .कामरूप कामख्या का वर्णन मैंने कई किताबों में पढ़ रखा था .और फिर हमारे मिथिलांचल में तो इस बारे में कई तरह की किम्वदंतियां प्रचलित हैं जैसे वहां की औरते बड़ी मायावी होती हैं जो बाहरी आदमियों को कबूतर या भेदा बना के अपने पास रख  लेती हैं .इस लिए जो एक  बार कमाने के लिए  आसाम जाता था लौट के कम ही आता था . लोक गीतों में प्रचलित मोरंग भी वही जगह है .
                                     वहाँ की महिलाएं सचमुच मोहक हैं ,अपने पारम्परिक पोषक में तो वो और भी मोहक लगती हैं .(मंदिर प्रांगन में ढेर सारे कबूतर और भेड़ें थे क्या  वो सभी बिहारी मजदुर ही रहे होंगे ?)
                                   मंदिर की बनावट खास कर के उसका गर्भ गृह रोमांचित करता है .वास्तव में देख कर लगता है की यह जगह औघड़ों की साधना के लिए उप युक्त है .वैसे तो पुरे मंदिर में बिजली की व्यवस्था है,लेकिन गर्भगृह में कोई बल्व नहीं लगाया गया है इससे उस जगह की रहस्यात्मकता को बरकरार रखा गया है .इस से एक स्र्ध्हा का माहौल बनता है .
                                   गुवाहाटी जा कर अगर गेंडा नहीं देखा तो क्या देखा .हमने भी उसे उसके  अभ्यारण्य में 
जा कर, पास से देखा .गेंदा देखने हम लोग हाथी  परचढ़ कर गए थे यह भी हमारे लिए एक नया अनुभव था .
पता नहीं गेंदे जैसे निरीह प्राणी को देखने के लिए लोग हाथी पर चढ़ कर क्यों जाते हैं ?फिर वो तो बेचारा शाकाहारी भी होता है  .इतनी मोटी चमड़ी ,इतना विशाल शरीर ,लेकिन हाव -भाव   और मुद्रा से बड़े मासूम और भोले लगते हैं मुझे तो बड़े प्यारे लगे .उनकी  इतनी बड़ी संख्या देख कर  सोचने लगी कही यहाँ भी कुछ माया का चक्कर तो नहीं ? 

देश भक्ति कैसे?

हम फिल्म देख रहे थे अचानक पर्दे पर राष्ट्रगान दिखाया जाने लगा , सभी दर्शक उठ खड़े हुए लेकिन मैं अपने पैरों की समस्या की वजह से उठ नहीं पाई .जब राष्ट्रगान खत्म हुआ  तो मुझे   लगा कि हर कोई मुझे देख रहा है   मेरी मजबूरी थी फिर मुझे डर लगने लगा । इन दिनों देश का माहौल कुछ ऐसा बन गया है कि  ।कुछ स्वयंभू  नेता अपने  आप को भारतीय संस्कृति का रक्षक ,तथा कथित  देश भक्त।  ये लोग अपने तरीक़े से देशभक्ति  की व्याख्या  करते है ।उनके मुताबिक ,अगर  मैं जेएनयू में पढ़ती होती तो मुझे राष्ट्रद्रोही मान लिया जाता। अगर मैं मुस्लिम होती तो मुझे गद्दार मान लिया  जाता  ।फिर चाहे पुलिस से शिकायत हो या  पिटाई सबक सिखाने को कुछ भी  कर सकते हैं।

मैं हिंदू हूं क्योंकि मैंने हिंदू परिवार में जन्म लिया है मैं भारतीय हूं क्योंकि मैंने भारतवर्ष में जन्म लिया है   जन गण मन भारत का राष्ट्रीय गान है ((जो वस्तुतः चारण गान है) । हमें  उसका सम्मान करना चाहिए ।

में हिंदू हूं  लेकिन पूजा करने की मेरी कोई  बाध्यता  नहीं है।

मैं भारतीय हूं उसे साबित करने के लिए मुझे कोई बिल्ला नहीं लगाना पड़ता है ।

 वैसे ही  अपनी देशभक्ति को दिखाने के लिए  राष्ट्रगान के समय उठ खड़े होने की कोई बाध्यता  नही होनी चाहिए ।में मुझे लगता है ,सार्वजनिक   या मनोरंजन  स्थल पर राष्ट्रगान बजाना सही नही है । ना चाहते हुए भी हम उसका वह सम्मान नहीं  कर पाते हैं जो करना चाहिए  ।

Friday, June 22, 2018

प्रवासी न हो

आज कल की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हमसे काफी कुछ छूट रहा है । कुछ ऐसा जिसकी अहमियत हमे फ़िलहाल तो महशूस  नहीं हो रही है। लेकिन हमारे आने वाली पीढ़ी को इसकी कमी जरूर खलेगी | अपनी जड़ों से कटा आदमी जैसे मॉरीसस कभी फिजी के लोग अपनी जड़ों को जानने की बेचैनी में भारत आते हैं | उन्हें कोई कमी नहीं है फिर भी अपने मूल को जानने की इच्छा वहां की मिटटी से जुड़ाव महशुस होता है | 

अब,जब यहां भी हम अपने रिश्तों से तेजी से कट रहे हैं | हमारे घर भी कोई मेहमान नहीं आता | हमारी दुनिया छोटी से छोटी होती जा रही है मियां बीवी बच्चे किसी चाचा मामा फूफा मौसा की कोई जगह नहीं है | 

जबकि अतिथि देवो भवः  की भावना हम भारतीयों में अब भी है। हम जो भी खाते  हैं इच्छा रहती है कि मेहमानों को उससे बेहतर खिलाएं। हर घर में कुछ बर्तन, चादर, टेबल क्लॉथ, सोफा कवर, क्रॉकरी, वगैरा अलग रखा जाता है। मेहमानों के आने पर स्वागत करने के  लिए होता है। अगर  मेहमान के आने की पूर्व सूचना हो तो पूरा घर चमक उठता था  और अचानक घर आए मेहमानों के आने पर भी दरवाज़े तक पहुंचते पहुंचते टेबल पर कोई बढिया कपड़ा जरूर बिछ जाता था। ये कोई तीस पैतीस साल पहले के चलन की चर्चा कर रही हूं।  मेहमान के आते ही कुछ मीठे  के साथ पानी  दिया  जाता था  फिर फटाफट पूरी  और  आलू की भुजिया। गेस्ट खास हो तो सूजी का हलवा और पापड़। 

   ये  वो  जमाना था जब  लोग धडल्ले से डालडा खाते थे ,पचाते थे । अगर मेहमान महीने के अंत मे आए, और अड़ोसी पड़ोसी से काम नही चला, तो किराने  दूकान से खाते पर समान मंगवाये जाते थे।लेकिन आव-भगत मे त्रुटि न हो।

फिर धीरे धीरे बिस्कुट दालमोठ ,से काम चलने लगा | न मेहमान  फुरसत से आते हैं न लोगों में इतनी आत्मीयता रह गई है | अब तो फ्रिज में मिठाई पड़ी रहती है ,क्रॉकरी नई  की नई धरी  रह जाती है   | अब गेस्ट नहीं आते