Friday, June 22, 2018

प्रवासी न हो

आज कल की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हमसे काफी कुछ छूट रहा है । कुछ ऐसा जिसकी अहमियत हमे फ़िलहाल तो महशूस  नहीं हो रही है। लेकिन हमारे आने वाली पीढ़ी को इसकी कमी जरूर खलेगी | अपनी जड़ों से कटा आदमी जैसे मॉरीसस कभी फिजी के लोग अपनी जड़ों को जानने की बेचैनी में भारत आते हैं | उन्हें कोई कमी नहीं है फिर भी अपने मूल को जानने की इच्छा वहां की मिटटी से जुड़ाव महशुस होता है | 

अब,जब यहां भी हम अपने रिश्तों से तेजी से कट रहे हैं | हमारे घर भी कोई मेहमान नहीं आता | हमारी दुनिया छोटी से छोटी होती जा रही है मियां बीवी बच्चे किसी चाचा मामा फूफा मौसा की कोई जगह नहीं है | 

जबकि अतिथि देवो भवः  की भावना हम भारतीयों में अब भी है। हम जो भी खाते  हैं इच्छा रहती है कि मेहमानों को उससे बेहतर खिलाएं। हर घर में कुछ बर्तन, चादर, टेबल क्लॉथ, सोफा कवर, क्रॉकरी, वगैरा अलग रखा जाता है। मेहमानों के आने पर स्वागत करने के  लिए होता है। अगर  मेहमान के आने की पूर्व सूचना हो तो पूरा घर चमक उठता था  और अचानक घर आए मेहमानों के आने पर भी दरवाज़े तक पहुंचते पहुंचते टेबल पर कोई बढिया कपड़ा जरूर बिछ जाता था। ये कोई तीस पैतीस साल पहले के चलन की चर्चा कर रही हूं।  मेहमान के आते ही कुछ मीठे  के साथ पानी  दिया  जाता था  फिर फटाफट पूरी  और  आलू की भुजिया। गेस्ट खास हो तो सूजी का हलवा और पापड़। 

   ये  वो  जमाना था जब  लोग धडल्ले से डालडा खाते थे ,पचाते थे । अगर मेहमान महीने के अंत मे आए, और अड़ोसी पड़ोसी से काम नही चला, तो किराने  दूकान से खाते पर समान मंगवाये जाते थे।लेकिन आव-भगत मे त्रुटि न हो।

फिर धीरे धीरे बिस्कुट दालमोठ ,से काम चलने लगा | न मेहमान  फुरसत से आते हैं न लोगों में इतनी आत्मीयता रह गई है | अब तो फ्रिज में मिठाई पड़ी रहती है ,क्रॉकरी नई  की नई धरी  रह जाती है   | अब गेस्ट नहीं आते

Saturday, April 7, 2018

अनमोल रिश्ते

शहर मे अफवाहों का बाजार गरम था ,हम  बिगड़ते माहौल की चर्चा मे  सर को याद कर  ही रहे थे की ,तभी वौआ( सर के छोटे बेटे )ने फोन किया, कहा  बाउजी नहीं रहे ।हमें झटका लगा। (प्रोफेसर नरेश झा  TMBU मे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर। )इन्होने पी एच डी उन्ही के अंतर्गत किया है इसलिए वो शाब्दिक रूप से भी हमारे गुरु थे।   लगा जैसे सिर से स्नेह की छांव हट गयी हो।  छल प्रपंच से परे एक सरल इन्सान ।पिछले दंगो मे हम कई दिनो। तक उनके घर मे रहे थे।एक परिवार की तरह, हमें लगा ही नही हम मेेहमान हैं।  पूरे परिवार ने जिस आदर और   अपनेपन से रखा ,वो हमारे लिए अनमोल थाती है।   
अपने मूल इलाके से दूर ,ठेठ मैथिल परिवार से मिल कर हमे बहुत अच्छा लगता था। हम अक्सर उनके घर जाया करते थे और ये सिलसिला उनके 
रिटायरमेन्ट तक चला जिसका श्रेय ,कन्हाई जी की मां को जाता है।मिथिलांचल के एक से एक व्यंजन और उनका प्रेमपूर्वक आग्रह से खिलाना, हम उनके स्थाई मेहमान बन गए थे।
   कुछ दिन पहले उनकी पचासवी विवाह वार्षिकी थी । यह बड़ेे सौभाग्य की बात है। उनके श्रवणकुमार सरीखे बच्चों  ने बड़ेे उत्साह एवं धूमधाम से पूना के रिसौर्ट मे मनाया था ।उसी मौके पर सर ने अपनी खुशहाली एवं स्वास्थय का श्रेय अपनी अर्धांगिनी  को माना। सच है ,सर की दिनचर्या उनकी दिनचर्या बन गई थी।
ईश्वर से यही प्रार्थना है की इस विकट परिस्थिती  से उबर कर अपने मन की व्यथा  को भुला कर अपने बच्चों को पिता की कमी  महशूस न होने दें ।
सर को हमारा नमन एवं श्रद्धांजली

Wednesday, March 14, 2018

जख्मी हूँ

जख्मी हूँ।


जख्म कहाँ है,    क्यों बताऊं ?

कलेजा छलनी हुआ था, या पीठ पर  ख़ंजर गड़ा था ?

    क्यों बताऊं ?

बेड़ियां पैरों में  थी या गले मे फंदा पड़ा था?

          क्यो बताऊं?

बंधे थे हाथ दोनों या  जुबां पर ताले पड़े थे थे ?

          क्यों बताऊं ?

जख्म ये किसने दिए थे ,अपनो ने या गैरों ने ?

     क्यो बताऊं ?

चाशनी में डूबा तीर था ,म थी  ख़ंजर,

सोने की बेड़ियाँ थी,डोर रेशमी की थी।

    रंग बिरंगे नकाबों में छुपे चेहरे ,

मत कर  बेनकाब इन  चेहरों को ।

 हिल जाएगी भरोसे की नींव,

जिंदा रहने के लिए ,अच्छा है  राज को राज , रहने दो !

Wednesday, February 28, 2018

अबला नही सबला।

भागलपुर की महिलाएं हमेशा से प्रखर एवं मुखर रही हैं |बात चाहे उच्चशिक्षा की हो या नौकरी की ,बल्कि अपने पारिवारिक बिजनेस को सम्हालने का काम जो प्रायः पुरुष वर्चस्व का क्षेत्र मना जाता है उसमे भी यहाँ की महिलाएं सहयोग करने में किसी से पीछे नही हैं | लेकीन इन दिनों, आये दिन महिलाओं पर हो रहे अत्याचार की धटनाओं ने ये सोचने पर विवश कर दिया है , की आखिर वजह क्या है ?   हमे  पुलिस की कार्यशैली, उसकी संख्या ,एवं पुलिस के प्रति महिलाओं की सोच पर गौर करना चाहिए |भागलपुर  में अगल बगल क्षेत्रों से पड़ने आई छात्रों की संख्या में बेतहाशा वृद्घि हुई है |बढ़ते लॉज इसके उदाहरण हैं |उस हिसाब से पुलिस काफी कम है | पर उन इलाकों में नियमित गस्त से कुछ असर हो सकता है कम से कम सडक छाप मजनुओं को पकड़े जाने का डर  रहेगा पर ऐसा है नही|और सबसे बुरी बात ये है की अभीभी महिलाओं में पुलिस के प्रति वो विश्वास नही जगा है की वो निर्भीक हो कर पुलिस से सहायता ले सकें |

इन हालातों की वजह से अविभावक लडकियों को यहाँ भेजने से  कतराएँगे,जिस से जो भागलपुर महिला सश्तीकरण में काफी आगे था अब पिछड़ने लगेगा इसका सही उपाय यही है की लडकियाँ खुद को सबल बनाएं ,इतनी की उसे किसी पुलिस या  किसी के सहारे की जरूरत न हो ।        

Tuesday, February 27, 2018

उन्हें उड़ने दो।

हमारे गांव के पुश्तैनी मकान मे ,दिन रात फुदकती रहती थी , दो गोरैया सी  बहने  ,सोनी मोनी |माता पिता ने
अपनी  हथेली पर रख कर पाला है उन्हें | उधर दोनों बेटियां भी नाज करने  वाली हैं  |घरेलू काम में जितनी सुघड .उतनी ही ,सिलाई बुनाई में पारंगत  | हम कहते भी थे इन दो बहनों ने जादू की छड़ी छुपा के रखी होगी ,क्योंकी बड़ा सा मकान है खुला खुला सा ,चाहे उसकी सफाई हो या हमारी आवभगत ,सारा कुछ यूँ यूँ निबटा
लेती थी ।पिछली वार हम
सोनी की शादी में गये थे |रोती -बिलखती सोनी अपने ससुराल चली गयी |हम भी खूब रोए |रो -रो कर विदा किया हमारे रोने की वजह ये भी थी की अब पुरे घर की बागडोर कौन सम्हालेगा ? बिना मैनेजमेंट की पढ़ाई किये इतनी अच्छी व्यवस्था  किसी को कोई शिकायत की नौबत नही आती  थी ।अब भी  बेटी होंते ही  उसे विदा करने की तैयारी शुरू हो जाती है 


उधर प्रतिभावान बेटियों को पढाने की नही विदा करने की जल्दी रहती है ।चूँकि लडकी की कमाई नही लेने की सोच अभी भी दिमाग पर हावी है ,इसलिए उसको ज्यादा पढ़ाने की जहमत कौन और क्यों उठाएं | कोई बेटियों से पूछे ,वो भी तन मन धन से अपने माता -पिता का सहारा बनना चाहती हैं उन्हें एक मौका दे कर देखें ।

       ये तो जग जाहिर है ,कि बेटियां धन   से तो नही, पर तन मन से  परिवार, माता पिता की सेवा करती हैं।इसलिए  उन्हें भी आत्मनिर्भर बनाऐं। यकीन मानिए, वो सूद समेत  लौटाने जैसा होगा।

और आपके लिए जो  सम्मान उसके मन मे बढे़गा ,वो तो अनुभव करने की बात हैं।
 ये बाई वन ,टेक अनलिमिटेड वाला सौदा साबित होगा।






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Wednesday, February 14, 2018

आशिकाना मौसम

 लव का परब  -60 +
पाठक बाबा जब रिटायर्मेंट के बाद अपना ज्यादा समय घर में बिताने लगे तब उन्होंने देखा की पाठकाईन के रिटायर्मेंट का कोई स्कोप नही  है बल्कि उनके घर पर रहने से उनकी बिजीनेस और बढ़ ही गई है उनका घडी - घड़ी  चाय की फरमाइश ! कभी पोते को तेल लगा रही  होती थी, कभी पोती की चोटियाँ गूँथ  रही होती थीं, फिर अचार-पापड़ बड़ियाँ  तो चलती ही रहती थी ,अगर जरा फुर्सत मिली तो टी.वी.था | अलबत्ता उनके घर में रहने से उन्हें उन्हें फ्री फंड बन्दा मिल गया था जब चाहो बाज़ार र्भेज दिया  |
 इन दिनों  माहौल में वलेंटाईन  वीक की तरंग छाई थी ,बाजार में लडके बच्चे धडाधड गिफ्ट खरीद रहे थे | हुंह उन्होते मन में सोचा  ये दुकानदारी चलाने के टोटके हैं इन्हें कौन समझाए | लेकिन माहौल के तरंग का असर उन पर भी पड ही गया ,उन्हें पाठकाईन याद आ गई |लेकिन गिफ्ट के मामले में उनका सर घूम गया  साईंज, नम्बर ,छोटा बड़ा ,रंग डिजाइन कौन इन लफड़ों में पड़े |उन्होंने गुलाब जामुन और मलाई रबड़ी बंधवा लिया ,साथ में दो फूलों के गजरे  भी  ले लिए .उन्हें इन चीजों के साथ देख कर सब  हैरान हो गये बिना मंगवाए क्यों इतनी सारी  चीजें ले आए .? तभी बहु ने कहा  समझ में आ गया , मिठाई शंकर जी को भोग  लगाने के लिए और शंकर पार्वती के लिए फूलों की माला !
जय भोले नाथ तेरी जय हो ,जय हो ,जय हो |

Monday, January 8, 2018

नहाइए मत !

पूरे उत्तर भारत में शीत लहर का कहर जारी  है |

 ऐसे में मत नहाइए ,नहाना भारी पड सकता है ,फिर न कहना किसी ने रोका नही |
शुभ शुभ नहा के निकल आए तो बधाई आपको ,अगर फंस गये यानि  तबीयत गडबड हुई तो समझ लें आपका यह कृत्य आत्मघात की श्रेणी में आ  सकता है |हमारा कानून जिन्दा रहने की शर्तें भले पूरी न करे ,लेकिन अपनी मर्जी से आपको मरने की इजाजत नही  देता है |फिर अगर किसी ने पुलिस वाले को खबर कर दी  तो ? सीधा जेल ! जरा सोचिये जेल की खटमल वाली कम्बल में जाड़े की रात ,आप कोई घोटाले बाज नेता या लम्पट बाबा तो हैं नही की आपको फाइव स्टारों वाली सुविधा मिलेगी |
 नही नहाने की सलाह कुछ भक्तों को अखर सकती है क्यों न हो आखिर वर्षों के संस्कार जो ठहरे ,लेकिन हमारी गंगा माता हैं न !चाहे जैसा भी पाप करो बेचारी सभी के पाप धोने को तैयार रहती हैं 
इसी परोपकार के काम से बेचारी खुद मैली हो गई है |फिर सोचना क्या ठंड खत्म हो जाए फिर इक्कठे  एक सौ आठ बार हर हर गंगे |