Sunday, February 19, 2017

बदलाव आहिस्ता आहिस्ता

हम बदल रहे हैं .लेकिन बड़े प्यार से आहिस्ता –आहिस्ता ,इतना की हमे खुद पता नही हो रहा है .मजे की बात ये है की इस परिवर्तन के लिए न कोई आन्दोलन हुआ न तो कोई झड़पें हुई पर हम बदल गये .आप लाख कहें ,कोई हो नहो की आप तो अपनी परम्परा को सम्हालने वाले अकेले इन्सान है पर जब मै बिदुवार इसके लक्ष्ण गिनाउंगी तो कही न कहीं आपकी सुई अटक जाएगी ,और एक चुभन जरुर महसूस होगी हमारी भाषा ,पहनावा ,खाना –पीना ,रीती-रिवाज ,और विचारों ने तो ऐसी छलांग लगाई है की पुरानी सोच चारों खाने चित्त हो गया है . शायद ये ग्लोबल संस्कृति की शुरुआत हो . हमारी भाषा ,पहनावा ,खाना –पीना ,रीती-रिवाज ,और विचारों ने तो ऐसी छलांग लगाई है की पुरानी सोच चारों खाने चित्त हो गया है . शायद ये ग्लोबल संस्कृति की शुरुआत हो . 1. सबसे पहले अपनी बोली हिदी को लें.अंग्रेजी शब्दों से भरी हुई जिसमे क्षेत्रीय भाषा का तड़का लगा कर बोली जाने लगी है. 2. छोले भटूरे ,इडली डोसा ,चाउमीन ,ढोकला ,पावभाजी ,दही बड़ा ,पुरे देश में मिलती है ,और चाव से खाई जाती है . 3. सलवार सूट पर अब पंजाबियों का एकाधिकार नही रहा .सबों ने इसे स्वीकार कर लिया है लडकियों ने ही नही आंटियों को भी भा गया है . 4. कुंवारी लडकियों का नौकरी करना वो भी अपने घरों से दूर अकेली रह कर ,कल्पना से परे था,बल्कि कम औकात की बात होती थी .अब हर कोई नौकरिवाली पत्नी चाहता है . 5. लाडले बेटे का घरेलू कामो में अपनी पत्नी की हेल्प करने पर खून का घूंट पी कर रहने वाली माएं ,अब बेटे को कोओपरेटिव नेचर वाली सीख दे रही है 6. लडकों को भी अब नैपी बदलने ,पौटी साफ करने से कोई परहेज नही है . 7. परिवार के साथ दूर दर्शन पर चित्रहार या सिनेमा देखते वक्त एडल्ट सीन के समय लोग इधर उधर ताकने लगते थे .अब तो सोशल मिडिया पर घर की बहु बेटियां आधुनिक कपड़ों में सेल्फी पोस्ट करने में हिचक नही करती उधर ससुर जी like करने लगे हैं . 8. अपने शहर में होटल में खाना फिजूलखर्ची माना जाता था अब उसे रईसी माना जाने लगा है. 9. सबसे अछ्छी बात लडके लडकियों का एक समान पालन पोषण होने लगा है . 10. सबसे दुखद है ,खेती को छोड़ना .पहले नौकरी को निकृष्ट और खेती को उत्तम कार्य माना जाता था अब ठीक उल्टा नौकरी करने वाले अपने खेत बेच कर नौकरी वाले स्थान में भाग रहे हैं अपनी पहचान खो कर एक शहरी चेहरा बन कर रहने को अभिशप्त मनुष्य | .

Thursday, January 5, 2017

अपने अपने खोह ( फ़्लैट )

कोई सा फ़्लैट हो Cययसकता है ,ये कोई वृद्धा हो सकती है , ये किसी की माँ ,पत्नी ,सास ...... कोरिडोर में किसी के चलने की आवाज होती है .वो बड़े ध्यान से सुनती हैं ,उनका दिमाग चलने लगता है,आहट थोड़ी अलग सी है . क्या पता यहीं आता हो,उन्होंने गर्दन घुमाईे घर का जायजा लिया ,थोडा बिखरा है पर ,इतना तो दरवाजा खोलने से पहले भी किया जा सकता है .कोई धड से थोड़े ही दरवाजा खोलता है ?मान लो खोलने में देर हो गई पर जैसे ही उन पर नजर जाएगी वो, खुद समझ जाएगा (उम्र देख कर )क्यों देर हुई ,फिर ध्यान किचन पर चला गया ,चाय के साथ देने के लिए बिस्किट वगैरा हैं की नही. उन्हें याद आया,हाँ नमकीन वाले हैं फिर उन्हों ने अपने बालों में हल्की सी ऊँगली घुमाई ,बाल ज्यादा उलझे नही लगे अब उनमे कॉन्फिडेंस आगया ,अब ठीक है. कदमो की आहट उनके फ़्लैट तक आई पर बिना रुके आगे निकल गई . वे मायूस हो गई ,पर फिर अपने आप को झिड़का ,मालूम है की यहाँ कोई नही आता तो उम्मीद लगाने की जरूरत ही क्या थी? वो फिर से फोफे पर पसर गई .कोई तो आता नही पर ये उनके लिए एक खेल बन गया था .हर आहट उसकी मंजिल यानि घर के दरवाजे {जहाँ तक उनके कान उस आवाज का पीछा करते। आवाजों को वो अब पहचानने लगी है पडोस का नटखट बाबला ,उसे कभी चलते नही सुना हमेशा उसके दौड़ने की आवाजे सुनी है . उन्होंने मन में सोचा ये घर अंदर भी क्या ऐसे ही दौड़ता होगा ?उनके सामने वाले फ़्लैट का नौकर भगता हुआ निकलता ।उसकी मालकिन उसे भाग कर सामान लेने भेजती,कहते हुए , जल्दी ले के आ सब्जी बनानी है ।पर वो लौटता ,बड़े आराम से कोई हिप हॉप गाना गुनगुनाता हुआ । शाह जी,दफ्तर जाने के पहले हिदायत देना नही भूलते,पर समझ में नही आता ,सारी हिदायते,घर के अंदर ,क्यों नही दे डालते ,क्या वो ये चाहतें है की लोग सुने? बेटा राहुल ,देर से लौटता था .तब भी मोबाइल नही छुट्ती थी ,इशारों से हाल चाल पूछता हुआ ।तब उन्हें बड़ी झुंझलाहट होती थी ।सारा दिन चुपचाप बीताने के बाद वो बताना चाहती थी की उस भागने वाले बच्चे का सर फूट गया ,तमाम हिदायतों के बावजूद शाह की पत्नी ने बिना पूछे दरवाजा खोल दिया ,कुरियर वाले के बहाने चोर काफी सामान उठा ले गए । .उन्होंने बेटे से कहा था कम से जस्ट पड़ोसी से जान पहचान रखनी चाहिए ।लेकिन रोहित ने कहा उसे खुद फुर्सत नही मिलती टीवी तक नही रखा है उन्होंने मन ही मन सोचा ,(यही बड़े शहरों की त्रासदी है )और उन्हें रहना ही कितने दिन हैं उन्हें ये सही लगा . रोहित की बीमारी की वजह से उन्हें आना पड़ा था.बीमारी पेट की थी डाक्टर ने घर का बना खाने की हिदायत दी थी इसलिए वो आई थी। लौटते समय उन्होंने मुड़ के देखा ,अब कौन सुनेगा उन आवाजौं को ,आवाजे यूँ ही आया करेंगी,खो जाया करेंगी शून्य में ।

Wednesday, December 21, 2016


मैथिलों की पसन्दिदा नॉनवेज –मैथिल बड़े चाव से नॉनवेज खाते हैं ,बहुत तरह के मांसाहार यहाँ प्रचलित है ,सबसे उपर मछली है .जो शुभ का प्रतीक मानी जाती है .अगर कही प्रस्थान से पहले मछली के दर्शन हो जाए तो यात्रा सफल मानी जाती है यों मैथिल अपने पूजा-पाठ ,धार्मिक अनुष्ठान ,व्रत-उपवास ,के लिए जाने जाते हैं.ऐसे में मैथिलों का मांसाहार आश्चर्य में डालता है ,ऐसे में उनका तर्क है की चूँकि प्राय मैथिलजन देवी के उपासक {शाक्त } होते हैं ,देवी की पूजा अर्चना के साथ भगवती को प्रसन्न करने के लिए प्राचीन कल से बली प्रदान की परम्परा रही है / उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए ,उस मांस को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं ,चूँकि वह प्रसाद होता है इसलिए उसमे प्याज –लहसुन ,जैसे अपवित्र वस्तु का प्रयोग नही किया जाता है/ वैसे वैष्ण्वजन निष्ठा के साथ धर्म का पालन करते हुए मांसाहार नही करते . यहाँ के लोग खस्सी का मांस ,मछली ,बगेडी {एक प्रकार की चिड़िया डोका ,केकड़ा ,कबूतर ,पोर्की ,बन मुर्गी ,कछुआ ,कई तरह कई मछलियाँ विशेष क्र छोटी मछली बहुत चाव के साथ खाते हैं .इन सब मांसाहार में एक तथ्य गौर करने वाली बात ये है कई ये सारे जीव जन्तुओं का खुद का आहार ,शुद्ध होता है अर्थात ये घास पात ,मिटटी ,इत्यादि पर निर्भर रहने वाले जीव होते हैं/ मैथिलों के खान पीन की समीक्षा करने वालों के लिए यह दिलचस्प विषय हो सकता है . यहाँ के मांसाहारी व्यंजनों में अधिक विविधता नही है ,लोग परम्परागत विधि से बनाए मीट ,मछली को अधिक पसंद करते हैं .अर्थात सरसों डाल के बनाई गई मछली ,या फिर जीरा गर्म मसाला डाल कर पकाया गया मांस . मांस पकाने की पारम्परिक विधि –सामग्री - मांस –आधा किलो .सबूत जीरा एक बड़ा चम्मच ,साबुत धनिया =दो चम्मच ,या धनिया पाउडर ,अदरक –एक इंच का टुकड़ा ,गरम मसाला –दो बड़ी इलायची ,पांच –सात लोंग ,एक टुकड़ा –दालचीनी ,काली मिर्च दस दाना नमक –हल्दी .सरसों तेल आधा कटोरी .दो चम्मच घी ,दो चार तेज पत्ता ,सुखी लाल मिर्च दो तीन . विधि –मांस को घो कर उसमे नमक हल्दी ,एक चम्मच दही ,दोच्म्म्च सरसों तेल डाल कर अच्छे से मिला कर ढंक कर रख दें ,गरम मसालों को अलग से पानी डाल कर पीस कर ढंक कर रख लें ,अब बाकी बचे मसालों को भी पीस लें .कुकर में तेल गरम करें उसमे दो तीन साबुत लाल मिर्च दोतीन तेज पत्ता ,डालें फिर उसमे ,मिलाया हुआ मांस पिसा मसाला डाल कर मंद आंच कर ढंक दें ,ढंकने से मीट पानी छोड़ता है .मंद आंच पर अंतराल पर मीट को भूनते रहें जब पानी पूरी तरह सुख जाए तब उसे थोड़ी देर और भुने जब मसाला तेल छोड़ने लगे तब उसमे आवश्यकता अनुसार पानी डाल कर कुकर में दस मिनट तक स्टीम लगाएं .कुकर खोलनेते- के बाद देख लें मांस गला है या नही एवं रस की मात्र सही हो तो उपर से पिसा गरम मसाला डाल कर मिलाएं ,अंत में दो चम्मच घी में जीरा डाल कर छोंक लें .मछली –{रस वाली }-सामग्री –मछली –आधा किलो ,तेल –आधा कटोरी ,सरसों –दो चम्मच .धनिया ,पाउडर या साबुत धनिया –दोच्म्म्च ,लाल मिर्च दो या तीन,टमाटर या कोई खटाई .नमक हल्दी ,मिर्च इच्छानुसार . मछली को खूब अच्छी तरह धो लें ,मछली का अच्छे से धोना महत्वपूर्ण है क्योकि अगर टुकड़ों में पित् का अंश छूट जाता है तो स्वाद में तीतापन आ जाता है .कम पानी से धोने से भी स्वाद में विषैलापन आ जाता है . मछली को धोने के बाद उसमे नमक हल्दी लागा कर रख दें .अब कडाही में तेल गरम करें ,जब तेल खूब गरम होजे तो आन्छ मंद कर उसमे मछली के टुकड़ों को डालें ,टुकड़ों को तेज आंच पर सुनहरा होने तक ,तलें ,तेल अगर बच जाए तो थोड़े से मेथी दाने एवं सुखी लाल मिर्च का फोरन डाले फिर उसमे गीला पिसा हुआ मसाला ,नमक हल्दी अगर टमातर हो तो दो टमाटर को छोटे टुकड़ों में काट कर डालें मसालों को हल्का भुने अब मसालों में जरूरत के अनुसार रस बनाएँ झोर जब रस खौलने लगे तो तली हुई मछली के टुकड़े उसमे डाल कर धीमी आंच में पकाएं . आवश्यकता अनुसार रस देखर गैस से उतर कर धनिया पत्ता से सजा कर परोसें

Saturday, December 17, 2016

Sunday, December 4, 2016

सुहाना सफर

भारतीय रेल में सफर कर रही हूँ,(पटना से भागलपुर) जिस में घड़ी पहनने की मनाही है। कैलेंडर भले साथ रख लो। मंजिल तक पहुंचने से मतलब है ,वक्त का क्या ,दो,चार,घण्टे से क्या फर्क पड़ता है। अपनी सोच को पोजेटिव बनाइये ,उतने ही पैसे में दस की जगह पन्द्रह घण्टे बैठ लिए,ए सी,, पंखे का मजा लिया ,आप फायदे में रहे । हाई रेट पर कैटरिंग में खाना मिलता है जो,कम खाओ ,गम खाओ जैसा है। बाकी ,फेरी वाले ढेरों आते है, रात का सफर है ,ये आपको सोने नही देंगे ,अच्छा है ,क्योंकि कही पुलिस नही है ।पुलिस की छवि मन मे बनाए रखिये ,मनोबल बना रहेगा । भारतीय रेल,सबको साथ लेकर चलता है।

Friday, December 2, 2016

मेरी सोन चिरैया

उड़ जा मेरी सोन चिरैया, जा उड़ जा  । सपनो से भरे सुनहरे पंख , कहीँ टूट न जाएं ,बांधा न था । ओ,मेरी सोन चिरैया  जा उड़ जा । तू न मुड़ के कभी देखना , न रुक के कभी सोचना । तेरे सामने हैं, उन्मुक्त गगन । जा छू ले अपनी मंजिल । ओ, मेरी सोन चिरैया  जा उड़ जा । गर कभी,चिलचिलाती धूप में , तुझे ठंडक का एहसास हो, ओ मेरी सोन चिरैया , समझना ये माँ का आँचल है । तेरे  हर कदम पर साथ होंगी । ओ मेरी प्यारी सोन चिरैया, मेरी आँखें ,तेरी राह देखेंगी, हम फिर साथ होंगे ।