Monday, March 6, 2017

माँ का लाल

टी.वी. पर अख़बारों में खबर छपती है ,सीमा पर एक जवान शहीद। कौन होगा ,वो अभागा जवान।जिन जिन के बच्चे सीमा पर तैनात होंगे,उनके परिवारों पर क्या बीतती होगी ? उस माँ का कलेजा हर आहट पर धड़क उठता होगा,न न वो मेरा बच्चा नही हो सकता।न जाने कितनी मन्नतों के बाद भगवांन ने उसे मेरी झोली में डाल है।क्या वापस बुलाने को? फिर मेरा बच्चा है भी बड़ा साहसी,कोई कैसे उसे मार सकेगा ,वो सेना में इसलिए गया की दुश्मनों के छक्के छुड़ा देगा ।ओ मेरे लाल ,तू अपने लक्ष्य को पाने के बाद लौटना,मैं तुझे तिरंगे में लिपटा हुआ नही बल्कि हर बार की तरह दौड़ के गले लग जाने वाले जांबाज सिपाही की तरह आना मेरे बच्चे।

Saturday, February 25, 2017

हम औरतें ।

हम औरर्ते ,मर्दों से कुछ हट के हैं। साड़ी,चूड़ी,गहने,श्रृंगार करते हैं हम औरते ,जीवन में रंग भरते है, हम मकान को घर बनाते हैं हम खण्डहर को गुलजार करते हैं। हम औरतें,मर्दों से कुछ हट के हैं। हम बहुरूपिये हैं । क्षण क्षण,र्रूप बदलते है, कभी प्रेमिका,कभी पत्नी,कभी मां बन जाते हैं। हमारी खुशियो पर नजर लगते देर नही लगती, ये नजर भी औरते ही लगाती हैं। हम औरते,मर्दों से कुछ हट के हैं। बेटे को, आज्ञाकारी बनाते हैं सासू माँ के लाडले को, जी भर कोसते हैं। हमे बात बात पर रोना। आता हैं । हम झट से खिलखिला पड़ते हैं। उँगलियों पर जोड़ कर पैसे देते हैं, सालगिरह,वर्षगांठ, हम नहीभूलते हैं। हम औरतें,मर्दों से कुछ हट के हैं।

Sunday, February 19, 2017

बदलाव आहिस्ता आहिस्ता

हम बदल रहे हैं .लेकिन बड़े प्यार से आहिस्ता –आहिस्ता ,इतना की हमे खुद पता नही हो रहा है .मजे की बात ये है की इस परिवर्तन के लिए न कोई आन्दोलन हुआ न तो कोई झड़पें हुई पर हम बदल गये .आप लाख कहें ,कोई हो नहो की आप तो अपनी परम्परा को सम्हालने वाले अकेले इन्सान है पर जब मै बिदुवार इसके लक्ष्ण गिनाउंगी तो कही न कहीं आपकी सुई अटक जाएगी ,और एक चुभन जरुर महसूस होगी हमारी भाषा ,पहनावा ,खाना –पीना ,रीती-रिवाज ,और विचारों ने तो ऐसी छलांग लगाई है की पुरानी सोच चारों खाने चित्त हो गया है . शायद ये ग्लोबल संस्कृति की शुरुआत हो . हमारी भाषा ,पहनावा ,खाना –पीना ,रीती-रिवाज ,और विचारों ने तो ऐसी छलांग लगाई है की पुरानी सोच चारों खाने चित्त हो गया है . शायद ये ग्लोबल संस्कृति की शुरुआत हो . 1. सबसे पहले अपनी बोली हिदी को लें.अंग्रेजी शब्दों से भरी हुई जिसमे क्षेत्रीय भाषा का तड़का लगा कर बोली जाने लगी है. 2. छोले भटूरे ,इडली डोसा ,चाउमीन ,ढोकला ,पावभाजी ,दही बड़ा ,पुरे देश में मिलती है ,और चाव से खाई जाती है . 3. सलवार सूट पर अब पंजाबियों का एकाधिकार नही रहा .सबों ने इसे स्वीकार कर लिया है लडकियों ने ही नही आंटियों को भी भा गया है . 4. कुंवारी लडकियों का नौकरी करना वो भी अपने घरों से दूर अकेली रह कर ,कल्पना से परे था,बल्कि कम औकात की बात होती थी .अब हर कोई नौकरिवाली पत्नी चाहता है . 5. लाडले बेटे का घरेलू कामो में अपनी पत्नी की हेल्प करने पर खून का घूंट पी कर रहने वाली माएं ,अब बेटे को कोओपरेटिव नेचर वाली सीख दे रही है 6. लडकों को भी अब नैपी बदलने ,पौटी साफ करने से कोई परहेज नही है . 7. परिवार के साथ दूर दर्शन पर चित्रहार या सिनेमा देखते वक्त एडल्ट सीन के समय लोग इधर उधर ताकने लगते थे .अब तो सोशल मिडिया पर घर की बहु बेटियां आधुनिक कपड़ों में सेल्फी पोस्ट करने में हिचक नही करती उधर ससुर जी like करने लगे हैं . 8. अपने शहर में होटल में खाना फिजूलखर्ची माना जाता था अब उसे रईसी माना जाने लगा है. 9. सबसे अछ्छी बात लडके लडकियों का एक समान पालन पोषण होने लगा है . 10. सबसे दुखद है ,खेती को छोड़ना .पहले नौकरी को निकृष्ट और खेती को उत्तम कार्य माना जाता था अब ठीक उल्टा नौकरी करने वाले अपने खेत बेच कर नौकरी वाले स्थान में भाग रहे हैं अपनी पहचान खो कर एक शहरी चेहरा बन कर रहने को अभिशप्त मनुष्य | .

Thursday, January 5, 2017

अपने अपने खोह ( फ़्लैट )

कोई सा फ़्लैट हो Cययसकता है ,ये कोई वृद्धा हो सकती है , ये किसी की माँ ,पत्नी ,सास ...... कोरिडोर में किसी के चलने की आवाज होती है .वो बड़े ध्यान से सुनती हैं ,उनका दिमाग चलने लगता है,आहट थोड़ी अलग सी है . क्या पता यहीं आता हो,उन्होंने गर्दन घुमाईे घर का जायजा लिया ,थोडा बिखरा है पर ,इतना तो दरवाजा खोलने से पहले भी किया जा सकता है .कोई धड से थोड़े ही दरवाजा खोलता है ?मान लो खोलने में देर हो गई पर जैसे ही उन पर नजर जाएगी वो, खुद समझ जाएगा (उम्र देख कर )क्यों देर हुई ,फिर ध्यान किचन पर चला गया ,चाय के साथ देने के लिए बिस्किट वगैरा हैं की नही. उन्हें याद आया,हाँ नमकीन वाले हैं फिर उन्हों ने अपने बालों में हल्की सी ऊँगली घुमाई ,बाल ज्यादा उलझे नही लगे अब उनमे कॉन्फिडेंस आगया ,अब ठीक है. कदमो की आहट उनके फ़्लैट तक आई पर बिना रुके आगे निकल गई . वे मायूस हो गई ,पर फिर अपने आप को झिड़का ,मालूम है की यहाँ कोई नही आता तो उम्मीद लगाने की जरूरत ही क्या थी? वो फिर से फोफे पर पसर गई .कोई तो आता नही पर ये उनके लिए एक खेल बन गया था .हर आहट उसकी मंजिल यानि घर के दरवाजे {जहाँ तक उनके कान उस आवाज का पीछा करते। आवाजों को वो अब पहचानने लगी है पडोस का नटखट बाबला ,उसे कभी चलते नही सुना हमेशा उसके दौड़ने की आवाजे सुनी है . उन्होंने मन में सोचा ये घर अंदर भी क्या ऐसे ही दौड़ता होगा ?उनके सामने वाले फ़्लैट का नौकर भगता हुआ निकलता ।उसकी मालकिन उसे भाग कर सामान लेने भेजती,कहते हुए , जल्दी ले के आ सब्जी बनानी है ।पर वो लौटता ,बड़े आराम से कोई हिप हॉप गाना गुनगुनाता हुआ । शाह जी,दफ्तर जाने के पहले हिदायत देना नही भूलते,पर समझ में नही आता ,सारी हिदायते,घर के अंदर ,क्यों नही दे डालते ,क्या वो ये चाहतें है की लोग सुने? बेटा राहुल ,देर से लौटता था .तब भी मोबाइल नही छुट्ती थी ,इशारों से हाल चाल पूछता हुआ ।तब उन्हें बड़ी झुंझलाहट होती थी ।सारा दिन चुपचाप बीताने के बाद वो बताना चाहती थी की उस भागने वाले बच्चे का सर फूट गया ,तमाम हिदायतों के बावजूद शाह की पत्नी ने बिना पूछे दरवाजा खोल दिया ,कुरियर वाले के बहाने चोर काफी सामान उठा ले गए । .उन्होंने बेटे से कहा था कम से जस्ट पड़ोसी से जान पहचान रखनी चाहिए ।लेकिन रोहित ने कहा उसे खुद फुर्सत नही मिलती टीवी तक नही रखा है उन्होंने मन ही मन सोचा ,(यही बड़े शहरों की त्रासदी है )और उन्हें रहना ही कितने दिन हैं उन्हें ये सही लगा . रोहित की बीमारी की वजह से उन्हें आना पड़ा था.बीमारी पेट की थी डाक्टर ने घर का बना खाने की हिदायत दी थी इसलिए वो आई थी। लौटते समय उन्होंने मुड़ के देखा ,अब कौन सुनेगा उन आवाजौं को ,आवाजे यूँ ही आया करेंगी,खो जाया करेंगी शून्य में ।

Saturday, December 17, 2016

Sunday, December 4, 2016

सुहाना सफर

भारतीय रेल में सफर कर रही हूँ,(पटना से भागलपुर) जिस में घड़ी पहनने की मनाही है। कैलेंडर भले साथ रख लो। मंजिल तक पहुंचने से मतलब है ,वक्त का क्या ,दो,चार,घण्टे से क्या फर्क पड़ता है। अपनी सोच को पोजेटिव बनाइये ,उतने ही पैसे में दस की जगह पन्द्रह घण्टे बैठ लिए,ए सी,, पंखे का मजा लिया ,आप फायदे में रहे । हाई रेट पर कैटरिंग में खाना मिलता है जो,कम खाओ ,गम खाओ जैसा है। बाकी ,फेरी वाले ढेरों आते है, रात का सफर है ,ये आपको सोने नही देंगे ,अच्छा है ,क्योंकि कही पुलिस नही है ।पुलिस की छवि मन मे बनाए रखिये ,मनोबल बना रहेगा । भारतीय रेल,सबको साथ लेकर चलता है।

Friday, December 2, 2016

मेरी सोन चिरैया

उड़ जा मेरी सोन चिरैया, जा उड़ जा  । सपनो से भरे सुनहरे पंख , कहीँ टूट न जाएं ,बांधा न था । ओ,मेरी सोन चिरैया  जा उड़ जा । तू न मुड़ के कभी देखना , न रुक के कभी सोचना । तेरे सामने हैं, उन्मुक्त गगन । जा छू ले अपनी मंजिल । ओ, मेरी सोन चिरैया  जा उड़ जा । गर कभी,चिलचिलाती धूप में , तुझे ठंडक का एहसास हो, ओ मेरी सोन चिरैया , समझना ये माँ का आँचल है । तेरे  हर कदम पर साथ होंगी । ओ मेरी प्यारी सोन चिरैया, मेरी आँखें ,तेरी राह देखेंगी, हम फिर साथ होंगे ।