Wednesday, October 2, 2013

वो डरावना सपना !

आज मैंने पहली वार ,भूतों वाला सपना देखा ! हा हा हा !  वैसे मुझे कभी भूत –प्रेत पर विश्वास नहीं रहा है .लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा हुआ! कल दो अक्टूबर था.यानि छुट्टी वाला दिन! धन्यवाद बापू !मै देर तक सोती रही .रिंकू ने जब चाय ला कर मुझे जगाया ,तब मै जागी .बड़े दिनों बाद बेड टी ! मजा आ गया .फिर दोपहर में भी भोजन के बाद हल्की सी झपकी ,यानि छुट्टी का बोनस !लेकिन फिर रात में मुझे नींद नहीं आ रही थी.मै बिस्तर पर जा कर लेट गई और अपनी आखें बंद कर लीं,ये सोच कर की थोड़ी देर में नींद आ ही जायेगी .वो सोने और न सोने के बीच की स्थिति थी .अचानक मुझे लगा की मै ड्राइंगरूम के सोफे पर सो रही हूँ.सोफे पर सोने के लिए पांव को सिकोडना पड़ता है ,फिर भी दिक्कत होती है. मैंने देखा एक औरत मेरे पांव के पास आ कर बैठ गई है.मुझे उसका चेहरा नहीं दिख रहा था.सिर्फ उसके गंदे से बेढब हाथ दिख रहे थे.वो मुझे छूना चाह रही थी,मैं डर से अपने पावों को सिकोडने लगी .जैसे-जैसे मै अपने पैर मोड़ती गई वो और मेरे करीब आती जा रही थी .अंत में मै सोफे के किनारे से सट गई.अब और कोई गुंजाईश नहीं थी  तब जा कर उसने मुझे छूआ ,फिर पकड़ लिया !मै आतंकित हो कर जोर से चिल्लाई ,मेरे गले से उई जैसी जोर की आवाज निकली .उसी आवाज से मेरी खुद की नींद खुल गई.मेरा पूरा शरीर थरथर थरथर कांप रहा था प्यास से गला सूख रहा था.क्या हुआ ये समझने में मुझे थोड़ी देर लगी .मैंने उठ के पानी पिया.तब तक मेरी नींद पूरी तरह टूट चुकी थी .सोचा अपना यह डरावना अनुभव लिख ही लिया जाय c!

Tuesday, September 17, 2013

भाग जाऊं कहीं !


रोज की नीरस दिनचर्या, संवेदनहीन समाज , ईर्ष्यालु लोग ,छद्म आचरण ,कूटचाल. नहीं ये दुनिया मेरे लिए नहीं है .जी करता है, भाग जाऊं कहीं

दरवाजे की घंटी बजती है ,खोलना पडेगा .
जी करता है, भाग जाऊं कहीं !
जी भर के सोऊँ .
कमरे में धूप घुस आए ,तब भी !
तकिये के नीचे सर छुपा कर ,
देर तक ,सोती रहूँ.
उनिंदी आखों से चाय बनती हूँ .
बाई को खुश ,रखने के लिए !
भाdhड में जाये ,बाई !
जी करता है ,भाग जाऊं कहीं !
नींद खुलते ही गरमा-गरम चाय का प्याला ,
मिल जाये ,तो मजा आ जाये !
लोग आते हैं ,चेहरे पर मुस्कान सजाये ,
शब्दों का आडम्बर ,भीतर से खोखलापन !
जी करता है ,भाग जाऊँ कहीं !
कोई तो करे ,सच्चे मन से बात ,
दिल तोड़ने नहीं .दिल जोड़ने की बात !
.

Thursday, August 22, 2013

मनहूस रात !

.अचानक कुत्ते के रोने कि आवाज  से नींद खुल गयी.अजीब मनहूस आवाज में कुत्ता जोर- जोर से रोये जा रहा था कुत्ते के रोने के बारे में इतने  डरावने  किस्से सुन चुकी हूँ की मन आशंकाओं में डूब गया.कुछ दिनों पहले की बात है ,मेरी पड़ोसन कमला जी के नंदोई बीमार पड़े ,उनका इलाज चल ही रहा था .कमला जी ,उनको दखने रांची के लिए गाड़ी से जैसे ही निकली दिन के समय .उनकी गाड़ी के पीछे कुत्ता जोर से रोया.मै उनको विदा करने निकली थी.कमला जी ने तो आवाज नहीं सुनी ,लेकिन मेरे रोंगटे खड़े हो गए .किसी तरह कुत्ते को भगाया.वहाँ पहुंच कर कमला जी ने फोन किया ,उनके नंदोई गुजर चुके थे.अभी आवाज इतनी तेज थी की लगा कहीं मेरी खिडकी के नीचे ही न हो.कहते हैं कुत्ता ,जिस घर की तरफ मुहं करके रोता है ,कुछ अनहोनी घटती है .मै चुप-चाप बिस्तर से उठी खिडकी से सर बाहर निकाल कर देखा ,कुत्ते का सर दिख रहा था.बाहर चांदनी रात थी .कुत्ता मैदान की और मुहं करके फिर रोया .मुझे बड़ी तसल्ली हुई.फिर भी मैंने जोर से हल्ला करके उसे भगा दिया.मेरी आवाज से इनकी भी नींद खुल गयी.इन्होने पूछा क्या हुआ ?मैंने कहा यूँ ही कुत्ता ज्यादा शोर मचा रहा था ,मैंने भगा दिया.ये तो करवट बदल कर सो गए ,मुझे पता नहीं कब नींद आएगी

Sunday, July 21, 2013

लाइफ के कम्प्लिकेशनस



मै तो छोटे शहर में रहती हूँ .लेकिन मेरे बच्चे बड़े शहरों में रहते हैं .छोटे शहर भले ही शहर कहलाते हों .लेकिन थोडा सा गंवई टच अभी भी बरकरार है .सहज जीवन .आराम की दिनचर्या ,लोग जैसे घर में होते हैं ,वैसे ही बाहर भी होते हैं .हाँ ,थोडा बहुत कपड़ों में फेर बदल होता है सो अलग बात है .जब कभी मेरा बच्चों के पास जाना होता है ,उनकी जीवन शैली देख कर मुझे बड़ी हैरानी होती है .कभी कभी तो झल्लाहट भी होती है . सुबह चाहे कितने भी सबेरे निकलना हो ,=बाथरूम में घुसेंगी pureपूरे पिटारे के साथ ! जिसमे होता है शैम्पू ,फेसवास,साबुन ,कंडीशनर .बौडी लोशन और स्प्रे .और भी जाने क्या क्या !इस चक्कर में चाहे सुबह का नास्ता छूट जाये या  दौड कर बस पकडनी पड़े. चलता है .! एक तो इतने तामझाम ऊपर से तरह –तरह के ब्रांड ! मेरा  तो सर ही घूम जाता है .हम लोगों के समय  लक्स या हमाम था ,थोडा बढे तो पियर्स बस ! कपडे साफ करने के लिए 501  या सनलाईट और सर्फ़ ज्यादा सर खपाने की जरुरत ही नहीं .
अब खाना पकाने वाले तेल हो ,चायपत्ती हो ,चप्पल हों या गाड़ी ,इतनी विविधता
है की चुनना मुश्किल ! नए लोग भले इसे बाजार वाद की सफलता बताएं ,लेकिन
मुझे पहले वाली सहजता भली लगती है .

Sunday, April 28, 2013

सीता,तुम्हारे मायकेवाले आये हैं ।

जब हमारा सीतामढ़ी जाने का कार्यक्रम बना तो मुझे बडी ख़ुशी हुई।दरअसल हम मिथिलांचल के लोग सीता जी को अपनी बेटी मानते हैं .खास कर नेपाल सीमा से सटे छेत्र (जनकपुर .जो सीता मैया का जन्म स्थान है )के लोग .हम अभी भी अपनी बेटियों का विवाह उस तिथि को नहीं करते ,जिस दिन राम -सीता का विवाह हुआ था .यह सर्व विदित है की सीता जी का विवाहित जीवन कभी सुखी नहीं रहा .बल्कि यहाँ के लोक गीतों में श्री रामचंद्र को उलाहना भी देते हैं ,क्योंकि इस नाते वो पूरे मिथिलांचल के दामाद -बहनोंई हैं .बिहार के सीतामढ़ी का इलाका अगर उनका मायका है तो उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के पास जो सीतामढ़ी है वो उनका ससुराल माना जायेगा .इस तरह यह सम्बन्ध निभाने जैसा लगा .इलाहाबाद से डेढ़ घंटे की दूरी पर यह स्थान है और माना जाता है की सीता जी इसी स्थान में धरती में समाहित हो गयी .थीं . . वहां पहुँच के सुखद आश्चर्य हुआ की उस सुदूर देहात में इतना सुन्दर और भव्य मंदिर ! इस मंदिर का निर्माण दिल्ली के बड़े उद्योग पति श्री लोयड ने करवाया है .मंदिर और वहां की मानव -निर्मित दृश्यावली इतनी आकर्षक है की जी नहीं भरता .मंदिर के चारों ऑर प्र कृ ति की निराली छटा मन मोहने वाली है . मंदिर प्रांगन में ही बाहरी पर्यटकों के लिए सभी सुविधाओं से युक्त गेस्ट हॉउस और शानदार रेस्टोरेंट भी है .मैंने देखा एक नव -विवाहित ग्रामीण दम्पति उस रेस्टोरेंट में आ कर खूब खुश थे . सही भी था ,जो अपनी पत्नी को इलाहाबाद घुमाने नहीं ले जा सकता है उसे वैसा ही आनंद अपने गांव में मिल रहा था .मंदिर के बाहर ग्रामीण मेले का नजारा हमे खूब भाया . दर्शन के बाद चूँकि हमारे पास काफी समय था इसलिए हमने गाँव घुमने का विचार किया .क्योंकि हमारी ट्रेन रात की थी .. वहां दयावंती स्कूल देख कर मै आश्चर्य चकित रह गयी .गाँव में इस तरह के स्कुल की मैंने कल्पना भी नहीं की थी .शहरों वाली सुविधा तो है ही .पढाई भी बढ़िया लगी बच्चे फटा फट अंग्रेजी बोल रहे थे .जो प्रायः ग्रामीण विद्यार्थियों का सपना हुआ करता है .रहने के लिए शानदार हॉस्टल ,हॉस्पिटल , बी .एड की पढाई .वाह !ये सारा कुछ पुंज लोयड कंपनी के सौजन्य से है .धन तो बहुतों ने अर्जित किया होगा लेकिन मंदिर , उस से भी अधिक शिक्छा का मंदिर बना कर इन्होने अपने धन का बड़ा ही सार्थक उपयोग किया है इस नेक काम के लिए मैंने मन ही मन उनका धन्यवाद किया और यहाँ की मीठी यादें ले कर वापसी को निकल पड़े ..........

Monday, March 25, 2013

चासनाला की होली

जब भी होली का त्यौहार आता है ,हमे चासनाला में बिताई होली जरुर याद आती है .कोई होली ऐसी नहीं होती जब हम अपने बाबूजी को याद नहीं करते .होली के दिन ,बाबूजी सुबह -सुबह सिलबट्टा ले कर बैठ जाते थे .भांग घोंटने का पूरा काम वे खुद ही करते थे .भारी शरीर की वजह से उन्हें पालथी मार कर बैठना पड़ता था लेकिन ये मुश्किल काम भी वे खुद ही करते थे .माँ को दही वडा के लिए उड़द की दाल पीसना होता था ,मीट का मसाला तैयार करना होता था .लेकिन वो सब बाद में ,पहले बाबूजी का भांग जरुरी होता था ,फिर भंग घोलने की तयारी होती थी ,उसमे दूध -चीनी ,ठंडई मसाला वगैरा डाल कर लोहे की एक पूरी बाल्टी भांग तैयार की जाती थी .फिर वो कुर्ता -वुरता पहन कर होली खेलने को तैयार हो जाते थे .उधर न तो मिक्सी न गैस पता नहीं माँ कैसे मैनेज करती थी सुबह से कोयले के चूल्हे पर पकवान बनना शुरू हो जाता था .पुतुल दी माँ की मदद करती थी .लेकिन मै शुरू से निकम्मी हूँ .मेरा समय पलाश के फूलों से रंग बनाने में बीतता था .लेकिन हमें नास्ते में नीम बैगन की भुजिया ,गरमा -गरम मालपुआ ,दही वडा खाने को मिल जाता था .ये सारे काम ग्यारह बजे के पहले निबटाना होता था क्योकि उसके बाद होली की टोली के आने का समय हो जाता था .सब सपरिवार होली खेलने को निकलते थे .रंग -अबीर -गुलाल सब एक साथ खेलते थे ,साथ में खाना पीना भी चलता रहता था .सब अपन्रे घर के सामने पकवानों के साथ निकलते थे .बाबूजी भंग की बाल्टी लिए तैयार रहते थे .हमारे यहाँ की भांग मसहूर थी सब को पकड़ -पकड़ कर भांग पिलाया जाता था .लोग डरते भी थे कंही ज्यादा नशा तो नहीं हो जायेगा ,लेकिन बाबूजी आग्रह के साथ पिलाते थे ,ये बोल कर की कुछ नहीं होगा . अंत में सब कभी सटर डे क्लब या एरिया मैनेजर के बंगले पर पहुँचते थे .फिर वहां महा -होली खेली जाती थी .यानी सबको पकड़ के पानी के चभच्चे में डुबाया जाता था . या फिर पाइप से पानी के फुहार से सबको भिंगोया जाता था दिन के एक या दो बजे सब घर लौटते थे .हम लोग तो नहाने रंग छुड़ाने में लगते थे .माँ लेकिन आते ही मीट बनाने की तैयारी में लग जाती थी .मसाला वगैरा पहले से तैयार होता था .जब तक सब नहा -धों कर आते थे मीट -भात तैयार हो जाता था .घूम -घूम कर उतना खाने के बाद भी .हम जम कर खाते थे फिर शाम से बाहरी लोगों का आना शुरू हो जाता था .उस बीच अगर किसी को भांग चढ़ गयी तो बाबूजी उन्हें सम्हालने में लग जाते थे .फिर तरह तरह के किस्से .पुरे दिन का विवरण किसने कितना खाया ,किसने कितना पीया . मुझे लगता है जिसने भी चासनाला -ऑफिसर कॉलोनी की होली खेली होगी ,उसे जिंदगी भर याद रहेगी .और हर साल उसकी चर्चा होती होगी .इतनी बढ़िया साफ -सुथरी ,सामूहिक होली अब कहाँ खेली जाती है।.

Saturday, February 2, 2013

बड़े। भैया,आप सा कोई नहीँ।

बड़े भैया आपसा कोई नहीं ! हमारे बड़े भैया ,(जेठ जी )अपने पद से (प्रभारी सचिव , बिहार विधान सभा )रिटायर हो कर लौटे . साथ में उनसे प्रभार लेने वाले अधिकारी भी थे वे भैया को घर तक छोड़ने आये थे .उन्हों ने ही बताया की किस तरह उनके सहयोगियों ने भाव -भीनी विदाई दी .कार्यालय का हर सहयोगी चाहे वो छोटा हो या बड़ा उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने आया .परिसर से विदा होते समय सहयोगियों ने अपने हाथों से गाड़ी को धकेल कर मुख्य गेट तक ले गए .चूँकि इन्होंने किसी तरह की भेंट लेने से मना कर दिया था इसलिय लोग फूलों के गुलदस्ते ले कर आये थे पूरी गाड़ी फूलों से भरी थी .यह सम्मान ,इसलिए था , की जीवन भर उन्हों ने लोगो का उपकार किया .भैया गद-गद थे ,इस भव्य सम्मान से हम भी अभिभूत हैं .आज कल के युग में एक सरकारी अधिकारी अगर बिना किसी आरोप या लांछना के ससम्मान रिटायर हो जाये तो यह बड़े गर्व की बात है एक एकौन्तेंट से प्रभारी सचिव तक की तरक्की ,उनकी कर्मठता दिखाती है यह नीचे से ऊपर जाने की संघर्ष गाथा है ..बड़े भैया सिर्फ कहने के लिए भैया हैं वैसे वह हमारे पिता तुल्य है .ससुराल में मुझे ससुर की कमी कभी महसूश नहीं हुई . युवा वस्था में ही पिता का देहांत हो गया .तभी से घर की पूरी जिम्मेदारी इन्हों ने अपने सर पर ले ली .तब नौकरी भी छोटी थी और घर भी छोटा था .कंकड़ बाग के विकर सेक्सन में दो कमरों के फ्लेट में रहना .अपने बच्चे ,भाई। उस पर से पटना की' गेस्टिंग ' .हमेशा गाँव के दो तीन लोग रहते ही थे .परिवार की इज्जत -प्रतिस्ठा ढोना मैंने यहीं देखा .कैसे भी करके मेहमानों को संतुष्ट करना। चाहे वो डाक्टर के यहाँ नंबर लगाना हो ,शादी -व्याह की खरीदारी हो या फिर गाँव के लोगों को पटना घुमाना हो .दोनों जने तन -मन -धन से लगे रहते हैं .साथ में अपने बच्चों को भी कभी रिक्शा बुलाने कभी पान लाने वगेरा काम में लगा देते हैं चाहे इसका खामियाजा उनकी पढाई पर पड़ता हो .मेरे पति आज जो कुछ हैं वो उन्ही की बदौलत .भाग्य से उन्हें सह -धर्मिणी भी अत्यंत सुघढ़ मिली हैं जेठानी जी नाम से ही नहीं स्वभाव से भी अन्नपूर्णा हैं।भैया को मिले यश में उनका भी कम योगदान नहीं है .अपने देवरों की प्रिय भौजी ,देवर ही नहीं उनके दोस्त भी उनका गुणगान करते नहीं थकते .जब हमारे बच्चे छोटे थे ,हम हर छुटियों में पटना जाते थे ,यह उनकी आत्मीयता ही थी जो हमें खींच लाती थी .हमें जब भी कोई दिक्कत होती है ,हम सीधे मुह उठा कर पटना चल देते हैं चाहे वो भागलपुर के दंगे हों या फिर बीमारी। .मै जब -जब बीमार पड़ी हूँ,उन्होंने माँ समान मेरी सेवा की . जीवन में मुझे इस बात का हरदम मलाल रहेगा की मै अपनी लाइलाज बीमारी की वजह से कभी उनकी सेवा नहीं कर पाऊँगी .मै उनकी ऋणी हूँ .अब जबकि भैया सेवा निवृत हो गए हैं ,ईश्वर की कृपा से जीवन की तमाम सुख - सुविधा उनके पास है .हमारी हार्दिक कामना है की आप , अपना शेष जीवन बिना किसी तनाव के शांति मय हो कर बिताएं अब तो आप स्वछंद हैं क्यों न ,निश्चिन्त हो कर जीवन का आनंद उठाये!