Friday, September 11, 2020

रिश्ता ,दिल का

 जितिया के पारण का दिन था,मैंने पूजा की,फल –मिठाइयों का भोग लगाया .मन उदास था.मुझे याद है, इन बच्चों ने ही ये व्रत शुरू करवाया था  जितिया के अगले दिन उन्हें मुझसे बड़ी शिकायत रहती थी ,क्योकि उस दिन जिन की माएं व्रत रखती थी लंच बॉक्स में बढिया –बढिया चीजें ले कर आते थे.फिर मै भी .बच्चों की पसंद के पकवान बनाती थी .अब तो त्योहारों में शायद ही कोई आ पाते हैं.बस फोन से मैं आशीर्वाद दे देती हूँ ,और वे भी अपना ख्याल रखने की हिदायतें दे देते है.मैं ये सब सोच ही रही थी की सूरज हडबडाता आया ,मेमसाब आपकी पूजा हो गयी ?सब्जी बन गयी है गरम-गरम ,पुरियां तल के लाऊं क्या?असल में साहब की तरफ से उसे सख्त हिदायत दी गयी थी की जैसे ही पूजा खत्म हो, मुझे झट से नास्ता परोसा जाय.बड़ा कठिन व्रत होता है ,फिर मेरी तबियत ठीकनहीं रहती है


                   सूरज तेरह-चौदह साल का लड़का,अब हमारे घर का सदस्य बन गया है.जब से मेरी तबियत खराब रहने लगी थी,मेरा घर में अकेला रहना थोडा असुरक्षित हो गया था. क्या पता कभी चकरा के गिर गयी तो? या फिर पांव ही फिसल जाये .हमारी कॉलोनी के पास एक बस्ती है.मेहनतकश लोगों की.कभी कभार बाजार जाने के क्रम में एक रिक्शा चालक से कहा था ,कोई घर के कामकाज में सहायता करने वाला, मिले तो बताना और ये भी जोड़ दिया था की उसके रहने, खाने-पीने दवाई-पढाई जैसी सारी जिम्मेदारी हम उठाएंगे . दो तीन दिनों बाद वही रिक्शा वाला , इसी सूरज को साथ लिए आ  खड़ा हुआ .उस वक्त इसने स्कूल ड्रेस पहना हुआ  था .उसे देखते ही मैंने उसे डाटते हुए कहा अरे ,इस बेचारे को क्यों पकड़ लाए ?इसकी पढाई छूट जायेगी.ये तो स्कूल जाता होगा.कोई गांव का गरीब हो तो लाना . उसने बोला ,मेमसाब ये मेरा ही लड़का है.मै तो रिक्शा ले के निकल जाता हूँ .मेरे पीछे ये स्कूल से भाग आता है फिर सारे दिन गली के शैतान बच्चों से मिल कर आवारागर्दी करता है .अपनी माँ का कहना नही मानता है .आपके पास रह कर सुधर जाएगा.इसकी जिंदगी बन जायेगी . मै सोच में पड़ गयी,कहीं आवारा बच्चों के साथ रह कर उन्ही जैसा बन गया हो तो हम तो मुसीबत में फंस जायेंगे .नौकरों द्वारा किये गए न जाने कई किस्से दिमाग में कौंध गए.शायद वह भी मेरे मन की बात भांप गया .कहने लगा नही-नही मेमसाब मैंने अभी तक इसे बिगड़ने नही दिया है .ये आपको कोई शिकायत का मौका नही देगा.मैंने लडके का चेहरा गौर से देखा चेहरे पर मासूमियत थी .नजरे झुकाए खड़ा था.मैंने उसे छोड़ जाने को कहा.अजनबी लोग नई जगह .उसका घर पास में था सोचा ,कहीं भाग ही न जाये .मैंने टीवी ऑन करके उसे बिठा दिया .फिर क्या था.वो मग्न हो कर टीवी देखने लगा .मेरी चिता दूर हुई .उसका अपना साबुन है .पेस्ट ,टूथ ब्रस,कंघी ,शीशा हर नए सामान को पा कर अचम्भित हो जाता था . .फिर तो सूरज ऐसा रमा की हम सारे दिन सूरज-सूरज करते रहते .वो दौड –दौड कर हमारी जरूरतें पूरी करता. सन्तान के सारे कर्तव्य वो करता. कभी- कभी तो उससे भी बढ कर उसने हमे सहारा दिया है .मैंने सूरज को प्यार से देखा वो मेरे हाँ कहने का इंतजार कर रहा था मैंने संतान को दिया जाने वाला पहला प्रसाद उसके हाथ में दे कर कहा ,जा बेटा, पहले प्रसाद खा ले फिर पूरी तलना .वो खुश हो कर अंदर भागा .

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