Monday, December 10, 2018

अच्छा है, देह बन कर रहना .


अच्छा है , देह बन कर रहना,

जब,जहाँ, जैसा, बन जाना,


शौक,अरमान,सपने,उमंग,


फेंक कर अंधे कुंए मे,


लौट कर वहीं आना।


बिछा देना इस देह को 


घर की देहरी पर । चाहे रखें जूते की नोंक पर


 या घसीटें चप्पलों से ।


 टांग देना इसे  दीवार पर ,

तस्वीर की तरह ।

न बीधेंगे व्यंग बाण,

न आहत होगा मन,

गूँजेगी घर में,


पहले ध्वनि, फिर प्रतिध्वनि।


बिस्तर पे बिछ कर, रसोई मे घुस कर,


इस देह को छोड़ देना।


अब न सिसकेगा, न समझेगा ।

कैसा होता है जलील हो कर रहना ।


अच्छा है, देह बन कर रहना ।

Tuesday, September 18, 2018

काले हीरे की बरकत

एक अरसा हो गया था धनबाद गए हुए| इसलिए जब पुतुल दी का जन्मदिन और रिटायरमेंट दोनो अवसर एक ही दिन होना था तो सोचा इससे अच्छा मौका फिर नही मिलेगा |
असल मे इस मौके को जम के सेलीब्रेट करने का आइडिया मन्नु का था |बच्चों की एनर्जी के क्या कहने !अपनी अपनी बहुत वयस्त जिंदगी से भी कुछ पल निकाल कर  जिंदगी को जी लेते हैं|शायद यही वो अनमोल पल होते हैं जिन्हे याद कर फिर से तरोताजा होकर अपनी रूटीनी सफर पर वापस चल देते हैं| रिजर्वेशन करवाने  से लेकर वहां की व्यवस्था सबकुछ  उन्हे करना था इसलिए अपनी जडो़ को फिर से देखना कई पुरानी सहेलियों से मिलने का मौका सोचा ,फिर नही मिलेगा|
ये अच्छा था की हम बरसात के दिनों मे गये थे|
लगा  वहाँ के पेड़  पौधे सब नहा धो कर  अपने सर्वोत्तम रुप मे हमारा स्वागत कर रही हो| वरना और दिनो में इन का सुन्दर हरा रंग कोयले की काली धूल की परत से छुपा रहता है |और काला दिखता है |
कोयलांचल का जीवन दूसरे इलाके के जीवन से कितना कठिन है,ये वहाँ रह कर दिखता है|कोयले की काली धूल भरी आंधी जो फेफडो़ के अंदर जम जाती है|  यहाँ फेफडो़ की बिमारी  झेलने की त्रासदी है|
झरियाऔर झरिया से लगे इलाके वर्षों की लगी आग की वजह से जस का तस दिखती  हैं |सरकार की वैधानिक चेतावनी के बावजूद ,पुराने समय से चले आ रहे व्यापार का केन्द्र झरिया को कोई छोड़ने को तैयार नही है|
बदहाल सड़कों की दशा देख कर लगता है सड़कें भर्ष्टाचार की कहानी  खुद बयान करती नजर आती है| देश को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला राज्य खुद इतना बेजार है| देख कर अफसोस होता है |अफसरों कर्मचारियों की लूट का नमूना बनी यहाँ की कम्पनी बंद करनी पडी़  |अवैध कोयला खनन पर वर्चस्व की लडा़ई में न जाने कितनी हत्याऐ होती हैं|खून खराबा चलता रहता है लेकिन आम लोगों को कोई नुकसान नही होता|
ये काला हीरा वहां की बरकत है तभी तो लोग इसे छोड़ नही पाते|

Friday, September 7, 2018

रिटायरमेंट नही रि स्टार्ट|

जीवन की दुसरी पारी|
आज पुतुल दी का जन्मदिन है,और आज ही उनके रिटायरमेंट का दिन भी है| मुझे लगता है,स्कूल ने उनके जन्मदिन पर सबसे बढि़या गिफ्ट दिया है| पुतुल दी फिल्में बहुत देखती है ं|मुझे दिल वाले...का वो डायलॉग उन पर सही लगता है,
'जा सिमरन जा,जी ले अपनी जिंदगी |'
सब तरह से फिट पुतुल दी कहीं से भी रिटायर्ड नही दिखती ,अच्छा है अब वो अपनी उन शौक के काम कर पाऐंगी जो अब तक नही किया |
हां उनके स्कूल के सहकर्मी,और नन्हे छात्र उन्हें जरूर मिस करेंग |मै ऐसा इस लिए कह रही हूँ क्यों की एक दिन उनका मोबाइल पर्स मे मेरे नम्बर पर लग गया ,ये टच स्क्रीन का कमाल था| उस एक घन्टे के दौरान उनके कार्यस्थल का जायजा मिल गया| वो छोटे बच्चे की क्लास थी| हम अपने एक दो बच्चे को पालने मे परेशान रहते हैं उधर ढे़र सारे बच्चों को सम्हालना छोटे बच्चों की छोटी छोटी शिकायतें इसने मेरी पेंसिल छीनी ,उसने मुझे धक्का मारा |अटेंडेंस की बारी आई कोइ सो रहा है,उसे उठवा कर हाजरी बनवाना| कोइ बच्चा नही आया तो क्यों नही आया| इतनी चिन्ता कौन करता है भला| यही उन्हे फेवरिट मैम बनाता है|
पुतुल दी हमारी भी फेवरिट हैं| हर जगह ,हर तरह की परिस्थिति में फिट होने वाली, गाना हो चाहे खाना बनाना और कई गुणों का पावर पैक |पुतुल दी को ढेर सारी शुभकामनाएं|

Sunday, September 2, 2018

दलितों कि राजनीति..

अब बाबा अंबेदकर के प्रपोत्र  RSS पर प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं|  जबरन किसी का मुँह बंदकर या प्रतिबंधित कर  समस्या का समाधान हो जाएगा  ?  नही, ऐसा नही है|


बल्कि यह  एक ऐसी संस्था है ,जो अपने स्वंसेवकों को सार्वजनिक. सफाई की शिक्षा   देता है|चाहे अपना मल मूत्र हो या किसी और की| 

बात प्रतिबंध की नही प्रतिबद्धता की  है|

अगर आप सवर्ण हैैं और दलितों के बारे मे कुछ आँखों को खोलने वाले  मुुुुद्दों को  बताना  चाहते हैं तो यह बड़ा मुश्किल है |ना जाने कौन इसे  किस चश्मे से  पढे़गा  ,फिर आपका इतिहास,भूगोल खंगाला जाएगा |आपके इससे पहले के वक्तव्यों के कोटेशन निकाले जाएंगे और उन्हें बिना किसी प्रसंग ,उन टुकडों को उछाला जाएगा|  ये नेतागिरी चलाने के टोटके हैं | यही लोग  अगर ईमानदारी से अपने  समाज के लिए कुछ करते तो तस्वीर कुछ और होती| समाज मे जब तक आर्थिक समानता नहीं होगी ,समाज इसी तरह टुकड़ो मे बंटा रहेगा| अगर कोई चपरासी ब्राह्मण हो और अधिकारी भी ब्राह्मण हो तब भी उसके साथ अधिकारी चाय नही पीता| ये पैसों की अलिखित व्यवस्था है| कोइ  भी दलित मंत्री अधिकारी बनते हैं तो  सबसे पहले खुद के, फिर अपने रिश्तेदारों में रेवड़ीयां बांटते  हैं |जब तक उसके समाज की बारी आती है ,आते आते सत्ता हाथ से निकल जाती है|

एक वार जो सवर्णो के द्वारा शोषण का ढोल पीट दिया गया वो निरंतर  बजता ही जा रहा है|

अब उनका शोषण उनके समाज के लोग ही कर रहे हैं| उनके समाज के नेता जो मंत्री बने हैं| उन्होंने वर्ण व्यवस्था को सुधारने के लिए क्या ठोस काम किया? उनके घरों में मल मूत्र की टंकी कौन साफ करता है| दलित अफसरों के टॉयलेट कौन धोता है ?बाबा साहेब की मूर्तियों को जहाँ तहाँ लगवाने की बजाय उनके सुझाए सुधारों को लागू करवाते तो तस्वीर अब तक काफी सुधर गई होती| बाबू जगजीवन राम की बेटी के लाईफ सटाईल की पहुँच कितनो  तक है| दलित क्वीन ,मायावती जी के क्या कहने ,जितना धन हाथीयों की मूर्तियों मे लगाया है  ,उतने मे कई स्कूल खोले जा सकते थे| सवर्णों और दलितों में खाई शिक्षा की  है| अब जबकी हर सरकारें ,कानून,प्रसाशन  उनके उत्थान को कटिबद्ध है ,तो जरुरत जाग्रति की है|

एक और दलित नेता  ने मंत्री बनने के बाद वही सारे शौक पालने शुरु कर दिए जो अय्याश नेता करते हैं |उनकी  जेब मे सोने की कलम रहने लगी| इसके बदले हर दलित बच्चे के हाथों मे कलम थमाई होती ,  तो ना जाने कितने दलित बच्चों का जीवन सुधर गया होता |यह समाज के बनाए कुचक्रों का खेल है अगर इनमें शिक्षा का प्रसार होता तो यह भी उसी समाज के अंग होते क्योंकि शिक्षित रहने पर  उन्हें नौकरी मिलती ,उनका जीवन स्तर सुधरता |

आज के आधुनिक समय में  पैसे से इज्जत आती  है किसी के माथे पर उसकी जाति का नाम नहीं लिखा रहता  |लोग आपको आपकी भाषा,रहने के जीवन स्तर से पहचानते है|जब तक इस कुचक्र को उल्टा घुमा कर सुचक्र मे नही बदला जाएगा ये नेताओं के बनाए दलदल मे धंसते चले जाऐंगे |

Sunday, July 29, 2018

चंगुल मे।

सुबह के 9:00 बजे हैं अभी मैं एम्स में हूं  ।पिछले पांच सालों से  मेरा इलाज चल रहा है । इन पाँच   साल मे मरीजों की संख्या मे चौगुना बढ़ौतरी हुई है। चारों ओर लोगों का रेला है चल रहा है।किसी को लाइन में लगना है, किसी को कमरा नंबर पता करना है, कोई अपने डॉक्टर का कमरा ढूंढ रहा है। इसे अफरा-तफरी ,ठेलम ठेला , धक्का मुक्की  जो भी चाहे कह  लेंं । लेकिन यह रोज का दृश्य है जबकि यहां तैनात सुरक्षाकर्मी काफी सहयोग करते हैं शायद उन्हें खास हिदायत दी जाती  होगी , कि उन्हें मरीजों और मरीजों के परेशान परिजनों  के बीच काम करना है  ।
मरीजों मे सबसे ज्यादा संख्या बिहारियों की है। सब मरीज बिहार के डॉक्टरों द्वारा बिगाड़े  हुए केस हैं । ये ईलाज के नाम पर मरीजों का खून चूसने का काम करते हैं ।जब सारे पैसे ख़त्म ना हो गलत इलाज चलता रहता है। जब  तक मरीज मर्णासन और कंगाल न हो जाए ।बिहारी
 अभी भी  पर्यटन के नाम पर   तीर्थ यात्रा करते हैं। दिल्ली का एम्स बिहारियों के लिए तीर्थ से कम नहीं है है। एम्स के डॉक्टर उनके लिए भगवान हैं   चाहे मरीजों से  बीमारी के बारे में  पूछने का रवैया  या दवाई लिखने की बात 
सस्ती और  सही दवा।
प्राइवेट में  डॉक्टर  बिना  जरूरत  ढेर सारी दवाइयां लिख देते हैं  क्योंकि  उन्हें कमीशन मिलता है  मंहगे टेस्ट करवाने को बोल देते हैं ।
पता नहीं  दिल्ली के एम्स के डॉक्टर  किस कुएं से पानी भी पीते हैं  और बिहार के डॉक्टर  किस कुएं का पानी पीते हैं । यहां डॉक्टर भगवान बन जाते हैं  और वहां के डॉक्टर  शैतान ।  मरीजों के पैसे से पैसे से आबाद हुए ये डॉक्टर आलीशान मकान मे रहते हैं।    डॉक्टर पिता की भुसकौल संतान ,क्लीनिक को चलाने के लिए डोनेशन देकर डॉक्टर बने ये लोग  मरीजों का खून चूस कर ही क्लिनिक चलते हैंं ।सालों से पटना में एम्स बनने की खबर सुन रही हूं  अगर बना भी हो तो वो विश्वस नहीं जमा है ।ये नेताओं की हवा हवाई है ।हमारी तकदीर में यही धक्का-मुक्की लिखा है ।अपने खून पसीने की कमाई डॉक्टरों के आगे उझल कर  आ जाते हैं। शायद पिछले जन्म का कोई कर्ज हो । मरीज बर्बाद हो रहे हैं डॉ आबाद हो रहे हैं। न  जाने कब  बिहार के डॉक्टरों की अंतरात्मा जागेगी और वो मरीजों का भला सोचेंगे ।
हे भगवान मुझे माफ करो मैं धरती के भगवान उकी शिकायत कर रही हूं ।लेकिन यह मेरी मजबूरी है क्योंकि  आपने उन्हें भगवान बना कर भेजा ,फिर वे शैतान क्यों बन गए?  हाँ ,अभी भी कुछ अच्छे और ईमानदार डॉक्टर हैं।मेरे इस आलेख से उन्हें ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमा चाहुँगी। लेकिन सच्चाई यही है।

Wednesday, July 11, 2018

रंगमंच से

छोटे शहरों में अभी भी मनोरंजन के नाम पर फिल्में ही देखी जाती हैं चाहे वह हॉल में हो या TV पर इसलिए दिल्ली में नुक्कड़ नाटकों से जुड़ी कोमिता से मिली तो बातों ही बातों में मैंने उससे कहा मैंने अभी तक कोई बढ़िया नाटक नहीं देखा तो उसने ज्योती डोगरा की एकल मंचन वाली  नाटक देखने को कहा यह नाटक छतरपुर में होना था शायद सारे लोग दिल्ली की कलाजगत से जुड़े    लोग थे ।पूरा माहौल काफी कलात्मक लग रहा था हल्का प्रकाश और मोमबत्तियों की जगमगाहट, हॉल  खचाखच भरा था । इस फास्ट फास्ट जमाने में इत्तमिनान से नाटक शुरू हुआ काफी लंबा  सांसों के उतार-चढ़ाव से शुरू हुआ उनका नाटक,दर्शक दम साधे नाटक देख रहे ।  विषय चाय था ।एक चाय के इतने आयाम हो सकते हैं? सोचा न था दर्शक भले अभिजात्य वर्ग के थे  लेकिन प्रसंग दिल्ली के मध्यम वर्ग से जुड़े थे।
नाटक देखने के बाद यही ख्याल आया दूध की उम्मीद में मेरे हाथ में मलाई आ गई ।नाटक के बारे में सिर्फ एक शब्द अद्भुत  ! चाहे वह अभिनय हो, परिकल्पना हो, मंच पर प्रकाश का प्रयोग हो बल्कि पूरी तरह  प्रयोग शाला  थी ।कहने को यह एकल अभिनय था लेकिन दर्शकों को साथ समेटते हुए उन्हें भागीदार बना कर । कुछ तो बात थी। पर हां, दर्शक  भी खास थे ।  विलक्षण कलाकार हैं ज्योति डोगरा जी।   एक अकेली महिला ने इतने रूप धरे , सब के सब हमारे आसपास के लोग  सारा कुछ हमारा देखा-सुना था पर सिर्फ आवाज से वैसा  माहौल बनाना कला है ।  दर्शक आत्मसात कर रहे r लगा   अगल बगल के परिवेश को खुद जिया हो बारीक से बारीक भाव भंगिमा।   चाहे औरत  की कुंठा हो,   या बुढापे की त्रासदी ,बदली आवाज़।  हमें पीछे की कुर्सियां मिली जब वह बैठ जाती थी ,हमें कुछ नहीं दिखता था उस समय में लगता था हम रेडियो सुन रहे हो रेडियो नाटक ! लेकिन फिर भी जो प्रभाव था उनकी आवाज की वजह से वह तारत्म्य बना रहा इतने सुंदर अभिनय के लिए मैं उन्हें बधाई देती हूं और शुभकामनाएं देती हूं

Tuesday, July 10, 2018

क्या फायदा ?

आधुनिकता ने हमे दो चीजों का श्राप दिया है।बाहरी तौर पर प्रदूषण और भीतर से तनाव और डिप्रेसन ।  !अब डाक्टर भी कहते पाए जाते हैं कि हर बीमारी की जड़ यही नासपीटा तनाव है। यहां तक कि फोड़े फुंसी भी ?
कैसे  ,कैसे  ,कैसे ?
वो ऐसे ,की जब कोइ राज आप अपने भीतर  छुपा कर रखते हैं ।जाहिर हैअब कम ही लोग खुले दिल के होते हैं । इसलिए हर चीज की तरह  कुछ दिनों में ये भी सड़ने लगतीं  हैंं  । शायद  यही वो  वजह हो सकती है ।
 अलबत्ता,टेंसन नही लेने का ,बिंदास रहने का,टेंसन देने का,लेने का नही ,जुमले खूब उछाले जाते हैं, दुकान में   आकाश छूती मंहगाई की बात  पर  दुकानदार झट से कहेगा आप इसकी 'टेंसन मत' लो जी ।
भैया पैसे मुझे देने हैं टेंसन कैसे न् लूं?
कुछ मामलों में टेंसन हो ही जाती है ।
आपने खूब मेहनत कर सुख सुविधा के सभी साधन  जमा कर लिए। सोचा होगा अब  चैन से रहेंगे, कोई टेंसन नही होगा।लेकिन  सुबह सुबह जब काम  वाली बाई नही आती है ,उस समय की बैचैनी याद है?
 तो पूरे दिन टेंसन टेंसन  टेंसन 
ऐसे ही आप की टेंसन की कई वजहें ड्राईवर ,गार्ड वगैरा होती हैं।
बच्चे स्कूल से लौटते हैं।
कहीं बैग,कहीं जूते, सबसे पहले टी.वी.खोल कर बैठ जाते हैं।
झुँ   झुँ   झुँ    झुंझुलाहट।
 ऐसे टेंसन के मौक़े आते रहेंगे,बस कोशिश करें इन मौके पर कूल बने रहें।बच्चे बैग,जूते फेकेंगे ही, उठाना आपका काम है।अबतक नही सिखाया तो कभी नही सीखेंगे। बच्चों के साथ आप भी  टी वी देखें।
पतिदेव शाम को शॉपिंग का वादा कर के नहीं आते हैं।
गु    गु    गु  गुस्सा।
आज नहीं तो कल उन्ही के  साथ शॉपिंग करना है। इस गलती का फायदा उठाने का मौका नहीं चूकें। आईस क्रीम की फरमाइश करें ।क्यों क्या की ओर मन को न लगाएं , गुस्से की दहक कम होगी।